**राधास्वामी!! वचन
07-07-2020-
आज शाम के सतसंग में पढे गये पाठ-
(1) होली खेलत सतगुरु नाल। पिरेमी सुरत रँगीली।।-(भक्ति दान मोहि फगुआ दीन्हा। मेटे सब दुख साल।।) (प्रेमबानी-3-शब्द-13,पृ.सं.303)
(2)इतनी अरज हमारी। सुन लो पिता पियारे। चरनो में गिरा हूँ। मैं दास अब तुम्हारे।।-( अपनी फिकर को तजके। औरों की चिन्ता सिर पै। लेने लगा यह मूरख। रचना का सिर पै भारे।। ) (प्रेमबिलास-शब्द-7,पृ.सं. 8)
(3) यथार्थ प्रकाश-भाग पहला-कल से आगे।! 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
**राधास्वामी!! 07- 07 -2020-
आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन- कल से आगे -(42 ) सभी मतों में, जो वर्तमान रचना का आदि मानते हैं, बतलाया जाता है कि रचना के आरंभ में एक शब्द प्रकट हुआ ।जैसे मुसलमान भाई कहते हैं कि खुदा ने 'कुन' ( हो) कहां और रचना हो गई ।
इंजील में लिखा है- खुदा ने कहा 'रोशनी हो' और रोशनी हो गई। उपनिषदों में जगह जगह लिखा है कि रचना के आदि में ब्राह्म ने' ईक्षण' किया कि मैं ऐसा हो जाऊँ या मैं रचना करूं, और यह भी लिखा है कि ब्रह्म में क्षोभ हुआ।
इन वर्णनों से प्रकट है कि धार्मिक पुस्तकें यह बतलाया चाहती हैं कि रचना के आदि में चेतनता के केंद्र में एक हिलोर उठी और फिर ईक्षण,ख्याल, इच्छा, हुकुम या इस प्रकार के और किसी रूप में शब्द प्रकट हुआ। (ईक्षण आदि सभी शब्द रूप है)।
राधास्वामी दयाल के उपदेश के अनुसार वह आदिशब्द 'राधास्वामी' था और जोकि रचना की क्रिया अब भी जारी है और वह शक्ति, जिसके बल से रचना का विस्तार हुआ, अब भी काम कर रही है , बल्कि रचना उसी के आश्रय पर स्थित है , इसलिए माना जाता है कि वह आदि शब्द अब भी पहले के समान जारी है, और यदि कोई मनुष्य अपनी सोई हुई आध्यात्मिक श्रवणशक्ति को जागृत करले तो वह उस शब्द को अपने अंतर में और प्रत्येक आध्यात्मिक केंद्र में हर समय सुन सकता है।
पर संसार में एक बड़ा भ्रम फैल रहा है । साधारण लोग मन ही को आत्मा समझते हैं और मन के ज्ञान को आत्मा का ज्ञान और मन की शक्तियों को आध्यात्मिक शक्तियां समझते हैं। और जोकि उन्हें मन के केंद्र में चित्तवृत्ति जोड़ने पर कोई चैतन्य शब्द सुनाई नहीं पड़ता इसलिए वे चैतन्य शब्द के अस्तित्व में विश्वास लाने और राधास्वामी नाम को निज नाम स्वीकार करने से लाचार हैं।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻
यथार्थ प्रकाश- भाग 1-
परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!**
No comments:
Post a Comment