**परम गुरु हुजूर महाराज-
प्रेम पत्र- भाग 1-
कल से आगे-( 3)
ऊपर के हाल से फर्क और तफावत रचना का एक दर्जे और सब दर्जो में समझ लो । यह बसबब मिलौनी खोल यानी माया के हुआ है और इस फर्क से कर्ता की हस्ती पर किसी तरह का दोष नहीं आ सकता है, क्योंकि निर्मल चेतन देश में , सत्तलोक और अलख लोक और अगम लोक की रचना में , किसी तरह का फर्क और तफावत नहीं है और नीचे के लोकों में, जहाँ से की माया का जन्म हुआ थोड़ा थोड़ा फर्क और तफावत पैदा होता गया और नीचे के मंडलों में ज्यादा बढ़ता गया।
यह रचना जो सतलोक के नीचे हुई है , ब्रह्म और माया की करी हुई है यानु सत्तपुरुष से सेवा करते इजाजत लेकर यह रचना करी है। सो इन माया ब्रह्म की निस्बत अलबत्ता इस कदर दोष लगाया जा सकता है कि उन्होंने जीवो को सत्तपुरुष का भेद नहीं दिया और वास्ते बढ़ाने को कायम रखने रचना के अपनी हद में अनेक तरह के धोखे देकर जीवो को अपनी हुकूमत में रखा और अनेक मत जारी करके उनको भरमा और भुला दिया। इसी वजह से संत फरमाते हैं कि ब्रह्म देश के पार जाना चाहिए ।
इस कर्ता का स्वरूप किसी कदर नाकिस है , यानी बसबब संगत माया के सफाई पूरी इसमें नहीं है। इसी सबब से इसकी रचना में भी कसर है।इस तीन लोक की रचना की उम्र है, यानी हद मुकर्र है, जैसे कि आदमी की उम्र है। यह सदा एक रस नहीं रहेगी। इसी वजह से संत कहते हैं कि इस देश में जन्म मरण से बचाव नहीं होगा। इस वास्ते जरूरी है कि ब्रह्म देश के पार जाना चाहिये।
क्रमशः
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
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