Sunday, July 12, 2020

राधास्वामी मत उपदेश



राधास्वामी मत उपदेश

(परम गुरु हुज़ूर महाराज)

भाग दसवाँ

(प्रेम प्रचारक दिनांक 29.6.2020 से आगे)

क़िस्म तीसरी

बाज़े सतसंगियों की अनजानता की बोल चाल और समझौती का वर्णन और उनको नसीहत

97- ऐसे सतसंगी कि जो संत सतगुरु से मिले, और उनके चरनों में थोड़ी बहुत पहचान करके उनका भाव और प्यार आवे बहुत कम होंगे। और जो उनमें से कोई ऐसा कहें या ख़याल करें कि हमको सतगुरु वक़्त मिल गये और अब कोई ज़रूरत किसी के मानने की नहीं रही, यह कहन उनकी अनसमझता की है। क्योंकि जब वह पहले सतसंग में आये और उपदेश लिया, उस वक़्त तो उनको सतगुरु में वैसा भाव (कि जो सतसंग और अभ्यास करके कोई दिन में पैदा हुआ) नहीं था, और उस वक़्त वे कुल मालिक राधास्वामी दयाल के निज स्वरूप में, जो कि अपार और अनंत है, भाव और प्यार लाकर राधास्वामी मत में शामिल हुए।

फिर रफ़्ता रफ़्ता सतसंग और अभ्यास करके और घट में परचे पाकर उनकी समझ बढ़ी, यानी सतगुरु को राधास्वामी दयाल का निज पुत्र और मंज़ूरे नज़र यानी प्यारा मानने लगे। और किसी किसी ने ऐसी समझ धारण की कि सतगुरु राधास्वामी दयाल के देह स्वरूप हैं और राधास्वामी पद उनका निज रूप और निज धाम है। इन दोनों सूरतों में निज स्वरूप राधास्वामी दयाल की महिमा और बड़ाई बदस्तूर रही, यानी वह पिता और भंडार स्वरूप हुआ और देह रूप निज धार और पुत्र स्वरूप हुआ। फिर जब कि इन दोनों स्वरूपों की महिमा और बड़ाई सतसंगी के हृदय में समझ बूझ के साथ बस गई और जो वह समझदार और विचारवान् है, तो राधास्वामी दयाल के उस देह स्वरूप की, जो उन्होंने प्रथम धारण करके राधास्वामी मत और उसकी नवीन और सहज जुगत को प्रगट किया, वैसी ही महिमा और बड़ाई समझकर प्रीति भाव उनके चरणों में लावेगा, जैसा कि अपने वक़्त के सतगुरु के देह स्वरूप में। लेकिन जोकि वह स्वरूप उसके सामने प्रगट नहीं है यानी गुप्त हो गया, इस वास्ते जो उसकी यादगार और बानी बचन या निशान या तसवीर मौजूद है, तो उसको उसी नज़र, भाव और अदब और प्यार से देखेगा और उसके साथ वैसा ही बरताव करेगा जैसे कि वक़्त के सतगुरु की तसवीर और उनके बैठने और पहनने और बरतने की चीज़ों से बरतता है, क्योंकि निज रूप दोनों देह स्वरूपों का एक ही है और वह अमर और अजर और सदा एकरस मौजूद है। देह स्वरूप जुदा जुदा होंगे पर जो शब्द कि उनमें व्यापक है, वह हमेशा एक ही है। फिर जो किसी देह स्वरूप का कोई निरादर करेगा या उसको ओछा समझेगा, तो गोया उसने निज रूप का निरादर किया और उसको ओछा समझा। फिर ऐसी समझ से दूसरा देह स्वरूप जिसमें वही निज रूप यानी शब्द मौजूद है, कैसे उससे राज़ी होगा ?

ऐसी समझ और ऐसा बरताव ज़ाहिर करता है कि उस सतसंगी को पहचान और समझ संत सतगुरु और उनके निज रूप की जैसा कि चाहिए बिलकुल नहीं आई, नहीं तो वह एक देह स्वरूप का आदर और दूसरे देह स्वरूप का निरादर न करता, यानी दोनों स्वरूपों में किसी तरह का भेद और फ़र्क़ न समझता। बल्कि जोकि संत सतगुरु बनाये हुए उस आदि स्वरूप या भेजे हुए निज रूप के हैं, तो वह आदि देह स्वरूप और निज स्वरूप दोनों पिता के स्वरूप हुए और मौजूदा स्वरूप संत सतगुरु का पुत्र रूप हुआ, तो हर सूरत और हालत में पिता रूप की महिमा और आदर ज़्यादा चाहिए न कि कम। और जो कोई एकताई समझे, तो भी दोनों में भाव और प्यार बराबर होना चाहिए। और जो कोई कमी करे, तो उसकी समझ ओछी और ग़लत है।

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