Thursday, July 9, 2020

प्रेम पत्र, संसार चक्र और रोजाना वाक्यात




परम गुरु हुजूर महाराज

 -प्रेम पत्र -भाग 1- कल से आगे-( 10 )

अब समझना चाहिए कि इस सुरत की धार को पहले उसकी बैठक की तरफ उलटना और समेटना और फिर वहां से यानी आंखों के ऊपर अंतर में होकर उसके भंडार की तरफ चढ़ाना, यह काम आत्मा यानी सुरत की कूव्वत का जगाना कहलाता है। रास्ते में कई स्थान यानी मुकाम है। सो जितनी दूर तक यानी जिस स्थान तक जो कोई पहुंचा उसी कदर उसकी सुरत जागी और उतना ही भेद कुदरत और रचना का उसको मालूम हुआ , यानी उस मुकाम से नीचे का सब हाल उसको मालूम पड़ा, पर जो कोई की धुर स्थान तक पहुंचा , जहां से आदि में सुरत का जहूर हुआ और वहां से नीचे नीचे रचना होनी शुरू हुई , उसको कुल भेद कुदरत का मालूम हुआ और उसी को दर्शन परम भंडार यानी कुल मालिक राधास्वामी दयाल का हासिल हुआ। और उसी का नाम परम संत और परम गुरु है और वही परम आनंद को प्राप्त होकर अमर और अजर हो गया और उसी की नरदेह सुफल हुई यानी उसी ने अपनी चेतन शक्ति पूरी पूरी जगाई।

क्रमशः।                         

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**





**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज -

【संसार चक्र】

- कल से आगे-

(तीसरा दृश्य)-

( एक जगह पर बहुत से मर्द व औरत जमा है, बीच में एक ऊँचा सिंहासन रक्खा है जिस पर एक साधु महात्मा बैठे हैं। हाथ में एक पुस्तक है। कथा शुरू होने वाली है। राजा दुलारेलाल और रानी इंदुमती चुपके से एक तरफ बैठ जाते हैं ।)

महात्मा- हाँ तो आज भी स्वेताश्वतर उपनिषद ही के कुछ श्लोकों की व्याख्या करेंगे।

 एक आदमी-( दुलारेलाल से ) महात्मा जी का बोल कैसा मीठा है।

दुलारेलाल -यह महात्मा जी कौन है?

वह आदमी- तुलसी बाबा है, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं , कई बरस से इधर ही रहते हैं , आठ दिन से कथा कर रहे हैं, आज समाप्त होगी।

महात्मा- चौथे अध्याय का आठवां श्लोक है।

एक आदमी -(हाथ जोड़ कर) हाँ महाराज! कल सातवे में श्लोक तक व्याख्या हुई थी । दो सदा इकट्ठे रहने वाले पक्षियों का दृष्टांत बड़ा ही अच्छा था।

महात्मा-' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्'।

एक आदमी -(खड़े हो कर) महाराज हिंदी भाषा में कृपा हो!

महात्मा -हाँ हाँ, हिंदी भाषा में ही कहेंगे, जरा चलने तो दो। ( मजमे को मुखातिब करके और बुलंद आवाज से)

महात्मा- उपनिषदकार कहते हैं जिस अविनाशी परम आकाश यानी परमात्मा में सारी ऋचाएँ ठहरी हैं यानी जिससे सारे वेद- मंत्र प्रकट हुए हैं और जिसमें सारे देवता स्थित हैं यानी सारे देवता जिसके आश्रय कायम है, जो इंसान उस परमात्मा को नहीं जानता यानी जिसने उसका दर्शन हासिल नहीं किया वह वेदमंत्रों से क्या करेगा?  जो उस परमात्मा को जान लेते हैं वहीं शांति से रहते हैं।  इसलिए हे सज्जनों! हम लोगों का वेदा आदि शास्त्र पढ़ना और सुनना तभी ठीक है जब हम वेदों के जन्मदाता यानि परमात्मा का दर्शन हासिल करने के लिए यत्न करें। जिस किसी को दर्शन प्राप्त है वही सुखी हैं, दूसरे सब दुख से दिन काटते हैं और जन्म मरण के चक्कर में फंसे रहते हैं।

क्रमशः                                   


🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**




**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

-रोजाना वाकिआत- 22 नवंबर 1932-

 मंगलवार-

यूनिटी कॉन्फ्रेंस की कामयाबी पर बहुत से लोग मालवीया जी को मुबारकबाद भेज रहे हैं। मैंने भी आज एक खत भेजा है । वाकई मालवीया जी ने इस मौके पर कमाल बुद्धिमानी व साहस से काम लिया है जिसके लिए हिंदुस्तान के सभी शुभचिंतक उनके कृतज्ञ हैं ।।   
                             

दिसंबर माह के जलसे के संबंध में अभी से लोग आने शुरू हो गए हैं। अगर यही हाल रहा तो क्रिसमस के दिनों में उम्मीद से ज्यादा भीड़ हो जाएगी । कुछ लोग मद्रास से आये हैं कुछ लाहौर से ।

 इसके अलावा जगह-जगह से मकानों के लिए चिट्टियां आ रही है। फंड में आज पूरा ₹30000 जमा हो गया है और सब इंतजाम जोर-शोर से जारी है । लेकिन साथ ही सर्दी भी दिन-ब-दिन रौनक पकड़ रही है ।

अगर दया शामिल हाल रही तो इरादा है कि संगत के सामने नया व्यापारिक प्रोग्राम पेश करूं और अगर उस प्रोग्राम पर अमल शुरू हो गया और कुछ अर्सा जारी रहा तो तमाम संगत की सूरत शक्ल निखर जाएगी।

इस वक्त हम लोगों के अंदर पहले हिन्द की सी सभी कमियाँ हैं। हमारे हौसले पस्त है । इसलिए जरा से नफा नुकसान की सूरत में हमारे मन जेर और जबर हो जाते हैं ।

हमें बेहतरी के लिए योजनाएं नहीं सूझती इसलिये तेली के  बैल की तरह एक ही केंद्र के गिर्द घूमते हैं । हममें मालिक की दया हासिल करने और उनसे फायदा उठाने की योग्यता नहीं है इसलिए अपना बहुत सा वक्त खेलकूद में नष्ट कर देते हैं।  हमें एक दूसरे के दु:ख दर्द का बहुत ही कम अहसाइ है। इसलिए एक दूसरे की मदद नहीं करते।

अगर संगत ने मेरा मशवरा कुबूल किया तो यह सब खामियां रफ्ता रफ्ता आप से आप दूर हो जाएगी। इसी उम्मीद पर क्रिसमस की जलसे का बोझ सर ने मंजूर किया है।


🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**







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