**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज -
【संसार चक्र】
- कल से आगे-
(तीसरा दृश्य)-
( एक जगह पर बहुत से मर्द व औरत जमा है, बीच में एक ऊँचा सिंहासन रक्खा है जिस पर एक साधु महात्मा बैठे हैं। हाथ में एक पुस्तक है। कथा शुरू होने वाली है। राजा दुलारेलाल और रानी इंदुमती चुपके से एक तरफ बैठ जाते हैं ।)
महात्मा- हाँ तो आज भी स्वेताश्वतर उपनिषद ही के कुछ श्लोकों की व्याख्या करेंगे।
एक आदमी-( दुलारेलाल से ) महात्मा जी का बोल कैसा मीठा है।
दुलारेलाल -यह महात्मा जी कौन है?
वह आदमी- तुलसी बाबा है, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं , कई बरस से इधर ही रहते हैं , आठ दिन से कथा कर रहे हैं, आज समाप्त होगी।
महात्मा- चौथे अध्याय का आठवां श्लोक है।
एक आदमी -(हाथ जोड़ कर) हाँ महाराज! कल सातवे में श्लोक तक व्याख्या हुई थी । दो सदा इकट्ठे रहने वाले पक्षियों का दृष्टांत बड़ा ही अच्छा था।
महात्मा-' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्'।
एक आदमी -(खड़े हो कर) महाराज हिंदी भाषा में कृपा हो!
महात्मा -हाँ हाँ, हिंदी भाषा में ही कहेंगे, जरा चलने तो दो। ( मजमे को मुखातिब करके और बुलंद आवाज से)
महात्मा- उपनिषदकार कहते हैं जिस अविनाशी परम आकाश यानी परमात्मा में सारी ऋचाएँ ठहरी हैं यानी जिससे सारे वेद- मंत्र प्रकट हुए हैं और जिसमें सारे देवता स्थित हैं यानी सारे देवता जिसके आश्रय कायम है, जो इंसान उस परमात्मा को नहीं जानता यानी जिसने उसका दर्शन हासिल नहीं किया वह वेदमंत्रों से क्या करेगा? जो उस परमात्मा को जान लेते हैं वहीं शांति से रहते हैं। इसलिए हे सज्जनों! हम लोगों का वेदा आदि शास्त्र पढ़ना और सुनना तभी ठीक है जब हम वेदों के जन्मदाता यानि परमात्मा का दर्शन हासिल करने के लिए यत्न करें। जिस किसी को दर्शन प्राप्त है वही सुखी हैं, दूसरे सब दुख से दिन काटते हैं और जन्म मरण के चक्कर में फंसे रहते हैं।
क्रमशः
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
No comments:
Post a Comment