Thursday, July 9, 2020

संसार चक्र ( नाटक )




**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-

【 संसार चक्र】-

कल से आगे :-

एक नौजवान-( खड़े होकर )

इस पर मुझे कुछ निवेदन करना है।

महात्मा-( नर्मी से) कहिए ।

नौजवान- निवेदन यह है कि परमात्मा ज्ञानेन्द्रियों से  से नजर नहीं आ नहीं सकता और जीव संसार में आंखों पर पट्टी बांधकर लाया जाता है। वह अपनी ज्ञानेन्द्रियों का इस्तेमाल कर के यहाँ का ज्ञान हासिल करता है, इसी तरीके से उसकी अक्ल, यादाश्त वगैरह शक्तियां जागती हैं जिनसे अनेक ख्याल पैदा होते हैं। तो जबकि ज्ञान लेने के लिए इंन्द्रियाँ ही जरिया है और इंद्रियाँ स्थूल पदार्थों के सिवाय किसी चीज का ज्ञान ले ही नहीं सकती तो फिर परमात्मा कहाँ से सिद्ध हुआ? और उसका दर्शन कैसे प्राप्त करें ?

(सब लोग तअज्जुब के साथ उस नौजवान की तरफ देखते हैं। बात खत्म करके बैठ जाता है।)

दूसरा नौजवान -(खड़े होकर )नहीं साहब यह नहीं है मनुष्य को तो स्थूल पदार्थों का भी ज्ञान नहीं हो सकता। ज्ञानेंद्रियाँ तो सिर्फ रूप, रस ,गंध वगैरह ले सकती हैं, स्थूल पदार्थ तो ज्ञानेंद्रियों के अंदर नहीं घुसते?

( अपने हाथ की लकड़ी दिखला कर)

 देखो !आपको लकड़ी नजर आती है यह लकड़ी का रूप दिखलाई देता है? हमारी आँखें, हमारे हाथ और हमारी वजन जनने की शक्ति जो कुछ जान लें सो जान लें इसके अलावा हमें लकड़ी का कुछ ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता । पह मेरी राय में तो न कोई परमात्मा है , न स्थूल जगत् है। सिर्फ मन है जो रूप, रस, गंध वगैरह का ज्ञान लेता है और जिसके अंदर इनके संबंधी भाव प्रकट होते हैं। मजमें के बहुत से लोग- बहुत खूब बहुत खूब।

दूसरा नौजवान बैठ जाता है।

 क्रमशः       

🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**


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