**परम गुरु हजूर महाराज-
प्रेम पत्र -भाग-1-
कल से आगे:-( 11)
अब मालूम हो कि यह काम सुरत शब्द योग के अभ्यास से हो सकता है, यानी सूरत को जिस धार पर कि सवार होकर उतरी है उसी धार के वसीले से चढाना। और वहीं धार जान और अमृत और रूह और शब्द की धार है , क्योंकि जहाँ धार जारी है वहीं आवाज भी संग है।
उस आवाज का, जैसे जैसे कि हर एक स्थान से प्रगट हुई, भेदी से भेद लेकर और उसी आवाज की डोरी को पकड़ कर यानी सुरत से तवज्जुह के साथ उस आवाज को सुनते हुए ऊपर को यानी उसके भंडार की तरफ, चलना सुरत शब्द योग का अभ्यास कहलाता है और यह सिर्फ संत मत में जारी है , यानी उसका विस्तारपूर्वक भेद आजकल राधास्वामी मत में मिल सकता है।
और किसी मत में भेद और चलने की जुगत का जिक्र भी नहीं है , सिर्फ इशारे में इस कदर महिमा शब्द की लिखी है कि आदि में शब्द प्रगट हुआ और शब्द ही कर्ता है और शब्द ही मालिक का स्वरूप है। पर इसका भेद कि किस तरह शब्द से रचना हुई और कैसे शब्द मालिक का स्वरूप है और किस तरह उसकी डोरी पकड़ के आदि यानी धुर स्थान तक, जहां से उसका अव्वल जहूर हुआ , पहुंचना हो सकता है और वह दूर स्थान कहां है, कुछ नहीं लिखा है और ना कोई मत वाला इस भेद का जानकार है।
इस सबब से सब के सब पोथियों और मजहबी किताबों के पढ़ने और पढ़ाने और बाहर की पूजा और रस्मों के चलाने में अटक गये और जो थोड़े बहुत विद्यावान और बुद्धिमान थे वे अपने आप को ब्रह्म यानी चैतन्य समझ कर चुप हो रहे। और इस शब्द से सच्चा उद्धार यानी सच्ची मुक्ति किसी की भी नहीं हुई और ना होती है।
क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
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