**परम गुरु हुजूर महाराज
-प्रेम पत्र- भाग 1
- कल से आगे-(2)
रचना के अरसे की कुछ तादाद नहीं है और ने उसका शुमार मुमकिन है। जो शुमार पुराण और दूसरी किताबों में लिखा हुआ है, वह सिर्फ इसी सूरज मंडल या उसके ऊपर के सूरज का है। और इसी सूरज मंडल को पैदा हुए, मुआफिक इल्म सितारों के, बेशुमार वर्ष गुजरे हैं।
और संत फरमाते हैं कि एक सूरज मंडल के नीचे दूसरा और दूसरे के नीचे तीसरा, इसी तरह रचना होती चली आई है ,यानी पहले सूरज मंडल का दूसरे मंडल का सूरज जो उसके नीचे है, एक तारा है ।
अब विस्तार रचना का ख्याल करो कि बुद्धि काम नहीं करता। और हर एक मैदान में बेहिसाब रचना है ।मैदान से आशा हर एक मंडल के घेर से है , सो हर एक मंडल में ऊपर से नीचे तक बराबर रखना होती चली आई है ।
ऊपर की रचना नीचे की बनिस्बत ज्यादा से ज्यादा निर्मल और रोशन है । जैसे इस लोक की हवा के मंडल में बहुत से दर्जे सूक्ष्मता और सर्दी के हैं और पहाड़ पर चढ़ने से इन दर्जो की खबर पड़ती है, या अपने मकान के ऊपर के मंजिलों मंजिलों पर चढ़ने से फर्क हवा का मालूम होता है ,इसी तरह रचना में मंडल है और उनकी रचना में ऊपर और नीचे के हिसाब से तफावत और फर्क है। सबसे ऊपर जो देश है निर्मल चेतन और बिल्कुल रूहानी है और वहां मिलौनी खोल या तह की नहीं है और इसी वजह से वह माया के मसाले की बनी हुई देह नहीं है (माया के मसाले के बड़े अंग पांच तत्व और 3 गुण हैं ) और इसी सबब से वह परम आनंद और सुरूर का मुकाम है ,और जन्म मरण और तकलीफ देह की वहां नहीं है ।
वहां पहुंचना सुरत का, वास्ते हासिल करने सच्ची और पूरी मुक्ति के, सब मंडलों को फोड कर, जरूरी है और यह काम सुरत शब्द योग के अभ्यास से बन सकता है और किसी तरह से मुमकिन नहीं है, क्योंकि शब्द की धार धुर से आई है, वे किसी न किसी नीचे के मुकाम से पैदा होकर उतरी है।
उन धारों को पकड कर उस मुकाम तक पहुंचन सकता है कि जहाँ से वह धारें निकली है, उस मुकाम से ऊपर यानी धुर स्थान तक किसी तरह से नही जा सकता है।
क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
-रोजाना वाकिआत-24 नवंबर 1932-
बृहस्पतिवार- करीबन 1 माह से ब्रह्मा की एक कंपनी ने कारखानाजात दयालबाग से रिश्ता जोड़ा था और बड़े जोर व शोर से काम शुरू किया था लेकिन आज खबर मिली कि कंपनी फेल हो गई और कारखानाजात कि सब उम्मीदें खाक में मिल गई। किसी इंसान का असर लेने से यही दुर्गति होती है।
रात के सत्संग में मगरिब में मजहब व खुदा के खिलाफ युद्ध के विषय पर बातचीत हुई ।वाकई मगरिब बेचारा क्या करें। न तो खुदा ही नजर आता है ना कोई ईश्वर भक्त। इंसान किताबें पढ़कर या दलीलें लबाकर मालिक में निश्चय करता है कि आनीशनवादी लेखकों की रचनाएं पढ़कर और अक्ल व उम्मीद के खिलाफ वाकिआते जिंदगी देखकर उसका निश्चय डोल जाता है ।
इसलिए बड़ी जरूरत इस बात की है कि इंसान को ऐसे बुजुर्गों की सोहबत व निकटता हासिल हो जिन्हे मालिक का आंखों देखा विश्वास हासिल है। वह मुल्क मुबारक है और वह सोसाइटी मुबारक है जिसमें ऐसे पूरे पुरुष मौजूद हों। उसी मुल्क के बाशिंदों और उसी सोसाइटी के मेंबरों के लिए मुमकिन है कि मालिक की हस्ती में सच्चा और टिकाऊ आस्था कायम करके प्रमार्थ के रास्ते की कोई मंजिल तय कर सके ।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
-【 संसार चक्र】
कल से आगे-
( सब लोग चुप हो जाते सन्नाटा छा जाता है।)
लोग-( किस कदर i होकर) महात्मा जी ! आप कुछ कहें तो शांति हो, नहीं तो आज सब कुछ स्वाहा हो गया।
4r महात्मा -जो बातेंं इन सज्जनों ने कही सोचने के लायक हैं, हँसी या घृणा के लायक नहीं है। यह बिलकुल दुरुस्त है कि सिर्फ बुद्धि का आसरा लेने से इंसान ऐसे ही नतीजों पर पहुंचता है । पर बुद्धि दूसरी सब ज्ञान- शक्तियों से बढ़कर उत्तम क्यों मानी जावे? क्या हम गाना बजाना देख सकते हैं? हर्गिज़ नहीं ।अगर हम आँख को कान से श्रेष्ठ समझे तो हमारे लिए कोई राजी नहीं रहता, लेकिन हम ऐसा नहीं करते। हम कान को मुनासिब अहमियत देते हैं और आँख की गवाही न होते हुए भी कान से प्राप्त ज्ञान को सच्चा मानते हैं। इसलिए हे सज्जन पुरुषों! बुद्धि को ज्ञान शक्तियों में से एक शक्ति मानो। अगर यह परमात्मा व आत्मा का अनुभव नहीं कर सकती तो ना करें, तुम्हारे हृदय में भी तो ज्ञान- शक्ति रहती है ? उससे पूछो, वह क्या कहती है? मैं पुकार कर कहती है कि परमात्मा जरूर है, आत्मा जरूर है । फिर क्यों ना उसका कहना माना जावे और क्यों केवल बुद्धि का आश्रय लिया जावे? इसीलिए महापुरुषों ने भक्तों को विद्वानों से श्रेष्ठ माना है और इसलिए महात्माओं ने बुद्धि तेज करने के बजाय हृदय शुद्ध करने पर जोर दिया है। आत्मा व परमात्मा का दर्शन हृदय की शुद्धता ही से प्राप्त होता है।
सब लोग- धन्य हो तुलसी बाबा, धन्य हो तुलसी बाबा ।
Rमहात्मा- शांति शांति ! (लोग चुप हो जाते हैं ) महात्मा -इसके अलावा विचार करो -आँख , कान बगैरा ज्ञानेंद्रियाँ एक हद तक का ही तो ज्ञान ले सकती हैं, फिर इनसे या इनके आसरे रहने वाले मन व बुद्धि से यह क्यों आशा बाँधी जाती है कि वह अनन्त व अपार परमात्मा का हाल जान ले?
लोग -सत्य है, सत्य है; यह मनुष्यों की भूल है।
महात्मा- सज्जन पुरुषों ! मन ,बुद्धि और चर्मेंद्रियों के पुजारी ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हैं कि उन्हें आत्मा और परमात्मा का कुछ पता नहीं चला लेकिन उनको यह कहने का अधिकार नहीं है कि आत्मा में परमात्मा है ही नहीं । क्या किसी अंधे के कहने पर हम सूर्य में विश्वास छोड़ देंगे?
लोग- हरगिज़ नहीं ,कभी नहीं ; यह कैसे हो सकता है?
महात्मा -वह महापुरुष, जिन्होंने ज्ञानेंद्रियों मन व बुद्धि की पहुँच से परे रसाई हासिल की और जिन्हें दुनिया तत्वदर्शी मानती है, साफ साफ कहते हैं कि आत्मा व परमात्मा है और साथ ही साथ खुद हमारे हृदय साफ-साफ गवाही देते हैं कि आत्मा व परमात्मा है; फिर हम अकेली अंधी बुद्धि का कहना क्यों माने? इसलिए प्यारे मित्रों! शास्त्र जरुर पढ़ो- इनके पढ़ने से पहले शुद्ध होता है- और परमात्मा का खोज जरूर लगाओ- परमात्मा के दर्शन ही से जन्म सफल होता है।
( जरा रुक कर और आवाज धीमी कर के)
सज्जन पुरुषों! अब समय हो चुका है, कथा समाप्त होती है, मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आप प्रेम व शांतिपूर्वक आज दिन तक मेरी कथा में शरीक हुए।
( महात्मा जी हाथ जोड़ते हैं) ।
लोग रुपया पैसा चढाते हैं। कुछ देर बाद लोग चले जाते हैं और राजा दुलारेलाल और रानी इंदुमती घर की राह लेते हैं।) क्रमशः
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर महाराज
-प्रेम पत्र- भाग 1
- कल से आगे-(2)
रचना के अरसे की कुछ तादाद नहीं है और ने उसका शुमार मुमकिन है। जो शुमार पुराण और दूसरी किताबों में लिखा हुआ है, वह सिर्फ इसी सूरज मंडल या उसके ऊपर के सूरज का है। और इसी सूरज मंडल को पैदा हुए, मुआफिक इल्म सितारों के, बेशुमार वर्ष गुजरे हैं।
और संत फरमाते हैं कि एक सूरज मंडल के नीचे दूसरा और दूसरे के नीचे तीसरा, इसी तरह रचना होती चली आई है ,यानी पहले सूरज मंडल का दूसरे मंडल का सूरज जो उसके नीचे है, एक तारा है ।
अब विस्तार रचना का ख्याल करो कि बुद्धि काम नहीं करता। और हर एक मैदान में बेहिसाब रचना है ।मैदान से आशा हर एक मंडल के घेर से है , सो हर एक मंडल में ऊपर से नीचे तक बराबर रखना होती चली आई है ।
ऊपर की रचना नीचे की बनिस्बत ज्यादा से ज्यादा निर्मल और रोशन है । जैसे इस लोक की हवा के मंडल में बहुत से दर्जे सूक्ष्मता और सर्दी के हैं और पहाड़ पर चढ़ने से इन दर्जो की खबर पड़ती है, या अपने मकान के ऊपर के मंजिलों मंजिलों पर चढ़ने से फर्क हवा का मालूम होता है ,इसी तरह रचना में मंडल है और उनकी रचना में ऊपर और नीचे के हिसाब से तफावत और फर्क है। सबसे ऊपर जो देश है निर्मल चेतन और बिल्कुल रूहानी है और वहां मिलौनी खोल या तह की नहीं है और इसी वजह से वह माया के मसाले की बनी हुई देह नहीं है (माया के मसाले के बड़े अंग पांच तत्व और 3 गुण हैं ) और इसी सबब से वह परम आनंद और सुरूर का मुकाम है ,और जन्म मरण और तकलीफ देह की वहां नहीं है ।
वहां पहुंचना सुरत का, वास्ते हासिल करने सच्ची और पूरी मुक्ति के, सब मंडलों को फोड कर, जरूरी है और यह काम सुरत शब्द योग के अभ्यास से बन सकता है और किसी तरह से मुमकिन नहीं है, क्योंकि शब्द की धार धुर से आई है, वे किसी न किसी नीचे के मुकाम से पैदा होकर उतरी है।
उन धारों को पकड कर उस मुकाम तक पहुंचन सकता है कि जहाँ से वह धारें निकली है, उस मुकाम से ऊपर यानी धुर स्थान तक किसी तरह से नही जा सकता है।
क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर महाराज
-प्रेम पत्र- भाग 1
- कल से आगे-(2)
रचना के अरसे की कुछ तादाद नहीं है और ने उसका शुमार मुमकिन है। जो शुमार पुराण और दूसरी किताबों में लिखा हुआ है, वह सिर्फ इसी सूरज मंडल या उसके ऊपर के सूरज का है। और इसी सूरज मंडल को पैदा हुए, मुआफिक इल्म सितारों के, बेशुमार वर्ष गुजरे हैं।
और संत फरमाते हैं कि एक सूरज मंडल के नीचे दूसरा और दूसरे के नीचे तीसरा, इसी तरह रचना होती चली आई है ,यानी पहले सूरज मंडल का दूसरे मंडल का सूरज जो उसके नीचे है, एक तारा है ।
अब विस्तार रचना का ख्याल करो कि बुद्धि काम नहीं करता। और हर एक मैदान में बेहिसाब रचना है ।मैदान से आशा हर एक मंडल के घेर से है , सो हर एक मंडल में ऊपर से नीचे तक बराबर रखना होती चली आई है ।
ऊपर की रचना नीचे की बनिस्बत ज्यादा से ज्यादा निर्मल और रोशन है । जैसे इस लोक की हवा के मंडल में बहुत से दर्जे सूक्ष्मता और सर्दी के हैं और पहाड़ पर चढ़ने से इन दर्जो की खबर पड़ती है, या अपने मकान के ऊपर के मंजिलों मंजिलों पर चढ़ने से फर्क हवा का मालूम होता है ,इसी तरह रचना में मंडल है और उनकी रचना में ऊपर और नीचे के हिसाब से तफावत और फर्क है। सबसे ऊपर जो देश है निर्मल चेतन और बिल्कुल रूहानी है और वहां मिलौनी खोल या तह की नहीं है और इसी वजह से वह माया के मसाले की बनी हुई देह नहीं है (माया के मसाले के बड़े अंग पांच तत्व और 3 गुण हैं ) और इसी सबब से वह परम आनंद और सुरूर का मुकाम है ,और जन्म मरण और तकलीफ देह की वहां नहीं है ।
वहां पहुंचना सुरत का, वास्ते हासिल करने सच्ची और पूरी मुक्ति के, सब मंडलों को फोड कर, जरूरी है और यह काम सुरत शब्द योग के अभ्यास से बन सकता है और किसी तरह से मुमकिन नहीं है, क्योंकि शब्द की धार धुर से आई है, वे किसी न किसी नीचे के मुकाम से पैदा होकर उतरी है।
उन धारों को पकड कर उस मुकाम तक पहुंचन सकता है कि जहाँ से वह धारें निकली है, उस मुकाम से ऊपर यानी धुर स्थान तक किसी तरह से नही जा सकता है।
क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर महाराज
-प्रेम पत्र- भाग 1
- कल से आगे-(2)
रचना के अरसे की कुछ तादाद नहीं है और ने उसका शुमार मुमकिन है। जो शुमार पुराण और दूसरी किताबों में लिखा हुआ है, वह सिर्फ इसी सूरज मंडल या उसके ऊपर के सूरज का है। और इसी सूरज मंडल को पैदा हुए, मुआफिक इल्म सितारों के, बेशुमार वर्ष गुजरे हैं।
और संत फरमाते हैं कि एक सूरज मंडल के नीचे दूसरा और दूसरे के नीचे तीसरा, इसी तरह रचना होती चली आई है ,यानी पहले सूरज मंडल का दूसरे मंडल का सूरज जो उसके नीचे है, एक तारा है ।
अब विस्तार रचना का ख्याल करो कि बुद्धि काम नहीं करता। और हर एक मैदान में बेहिसाब रचना है ।मैदान से आशा हर एक मंडल के घेर से है , सो हर एक मंडल में ऊपर से नीचे तक बराबर रखना होती चली आई है ।
ऊपर की रचना नीचे की बनिस्बत ज्यादा से ज्यादा निर्मल और रोशन है । जैसे इस लोक की हवा के मंडल में बहुत से दर्जे सूक्ष्मता और सर्दी के हैं और पहाड़ पर चढ़ने से इन दर्जो की खबर पड़ती है, या अपने मकान के ऊपर के मंजिलों मंजिलों पर चढ़ने से फर्क हवा का मालूम होता है ,इसी तरह रचना में मंडल है और उनकी रचना में ऊपर और नीचे के हिसाब से तफावत और फर्क है। सबसे ऊपर जो देश है निर्मल चेतन और बिल्कुल रूहानी है और वहां मिलौनी खोल या तह की नहीं है और इसी वजह से वह माया के मसाले की बनी हुई देह नहीं है (माया के मसाले के बड़े अंग पांच तत्व और 3 गुण हैं ) और इसी सबब से वह परम आनंद और सुरूर का मुकाम है ,और जन्म मरण और तकलीफ देह की वहां नहीं है ।
वहां पहुंचना सुरत का, वास्ते हासिल करने सच्ची और पूरी मुक्ति के, सब मंडलों को फोड कर, जरूरी है और यह काम सुरत शब्द योग के अभ्यास से बन सकता है और किसी तरह से मुमकिन नहीं है, क्योंकि शब्द की धार धुर से आई है, वे किसी न किसी नीचे के मुकाम से पैदा होकर उतरी है।
उन धारों को पकड कर उस मुकाम तक पहुंचन सकता है कि जहाँ से वह धारें निकली है, उस मुकाम से ऊपर यानी धुर स्थान तक किसी तरह से नही जा सकता है।
क्रमशः
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