Sunday, July 12, 2020

संसारचक्र




**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

-【 संसार चक्र】


 कल से आगे-

( सब लोग चुप हो जाते सन्नाटा छा जाता है।) 

लोग-( किस कदर निराश होकर) महात्मा जी ! आप कुछ कहें तो शांति हो, नहीं तो आज सब कुछ स्वाहा हो गया।

4r  महात्मा -जो बातेंं इन सज्जनों ने कही सोचने के लायक हैं, हँसी या घृणा के लायक नहीं है। यह बिलकुल दुरुस्त है कि सिर्फ बुद्धि का आसरा लेने से इंसान ऐसे ही नतीजों पर पहुंचता है । पर बुद्धि दूसरी सब ज्ञान- शक्तियों से बढ़कर उत्तम क्यों मानी जावे?  क्या हम गाना बजाना देख सकते हैं?  हर्गिज़ नहीं ।अगर हम आँख को कान से श्रेष्ठ समझे तो हमारे लिए कोई राजी नहीं रहता, लेकिन हम ऐसा नहीं करते। हम कान को मुनासिब अहमियत देते हैं और आँख की गवाही न होते हुए भी कान से प्राप्त ज्ञान को सच्चा मानते हैं। इसलिए हे सज्जन पुरुषों! बुद्धि को ज्ञान शक्तियों में से एक शक्ति मानो। अगर यह परमात्मा व आत्मा का अनुभव नहीं कर सकती तो ना करें, तुम्हारे हृदय में भी तो ज्ञान- शक्ति रहती है ? उससे पूछो, वह क्या कहती है? मैं पुकार कर कहती है कि परमात्मा जरूर है, आत्मा जरूर है । फिर क्यों ना उसका कहना माना जावे और क्यों केवल बुद्धि का आश्रय लिया जावे?  इसीलिए महापुरुषों ने भक्तों को विद्वानों से श्रेष्ठ माना है और इसलिए महात्माओं ने बुद्धि तेज करने के बजाय हृदय शुद्ध करने पर जोर दिया है। आत्मा व परमात्मा का दर्शन हृदय की शुद्धता ही से प्राप्त होता है।


सब लोग- धन्य हो तुलसी बाबा, धन्य हो तुलसी बाबा ।

Rमहात्मा- शांति शांति ! (लोग चुप हो जाते हैं ) महात्मा -इसके अलावा विचार करो -आँख , कान बगैरा ज्ञानेंद्रियाँ एक हद तक का ही तो ज्ञान ले सकती हैं, फिर इनसे या इनके आसरे रहने वाले मन व बुद्धि से यह क्यों आशा बाँधी जाती है कि वह अनन्त व अपार परमात्मा का हाल जान ले?

लोग -सत्य है, सत्य है; यह मनुष्यों की भूल है।

महात्मा- सज्जन पुरुषों ! मन ,बुद्धि और चर्मेंद्रियों के पुजारी ज्यादा से ज्यादा यह कह सकते हैं कि उन्हें आत्मा और परमात्मा का कुछ पता नहीं चला लेकिन उनको यह कहने का अधिकार नहीं है कि आत्मा में परमात्मा है ही नहीं । क्या किसी अंधे के कहने पर हम सूर्य में विश्वास छोड़ देंगे?

लोग- हरगिज़ नहीं ,कभी नहीं ; यह कैसे हो सकता है?

  महात्मा -वह महापुरुष, जिन्होंने ज्ञानेंद्रियों मन व बुद्धि की पहुँच से परे रसाई हासिल की और जिन्हें दुनिया तत्वदर्शी मानती है, साफ साफ कहते हैं कि आत्मा व परमात्मा है और साथ ही साथ खुद हमारे हृदय साफ-साफ गवाही देते हैं कि आत्मा व परमात्मा है;  फिर हम अकेली अंधी बुद्धि का कहना क्यों माने?  इसलिए प्यारे मित्रों!  शास्त्र जरुर पढ़ो- इनके पढ़ने से पहले शुद्ध होता है- और परमात्मा का खोज जरूर लगाओ- परमात्मा के दर्शन ही से जन्म सफल होता है।

( जरा रुक कर और आवाज धीमी कर के)

 सज्जन पुरुषों! अब समय हो चुका है, कथा समाप्त होती है, मैं आपका धन्यवाद करता हूं कि आप प्रेम व शांतिपूर्वक आज दिन तक मेरी कथा में शरीक हुए।

( महात्मा जी हाथ जोड़ते हैं) ।

लोग रुपया पैसा चढाते हैं। कुछ देर बाद लोग चले जाते हैं और राजा दुलारेलाल और रानी इंदुमती घर की राह लेते हैं।) क्रमशः

                       

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**



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