प्रस्तुति - उषा रानी /
राजेंद्र प्रसाद सिन्हा
**परम गुरु साहबजी महाराज
-सत्संग के उपदेश -भाग 2
-(33)-【 असली व झूठे त्याग में फर्क।】
:- दुनिया में जाहिरी त्याग की बड़ी महिमा है जो शख्स अपने जिस्म का बहुत सा हिस्सा नंगा रखें या ओढने के लिए मोटा कपड़ा या कंबल इस्तेमाल करें और सिर व दाढ़ी मूंछ के बाल लंबे व बेतरतीब रखे वह बड़ा त्यागी समझा जाता है और जो शख्स समय समय पर अपने त्याग का जिक्र करता रहे और रुपया पैसा छूने से इनकार करें उसकी महिमा का तो कुछ बार-पार ही नहीं है ।क्या वे सब लोग , जो इस किस्म के स्वांग बनाए फिरते हैं और बार-बार गृहस्थों से मिलकर अपनी जरूरियात पूरी कराते हैं, दिल से संसार के भोग बिलास को नफरत या लापरवाही की निगाह से देखते हैं ? अगर सच पूछा जाए तो खास लोगों का जिक्र छोड़ कर आमतौर पर ऐसे लोग यह स्वांग बतौर रोजगार के रचतज हैं क्योंकि वे बखूबी समझते हैं कि त्याग कि चिन्ह देखकर गृहस्थों के दिलों में सेवा के लिए बड़ी उमंग पैदा हो जाती है और वे त्यागी जी की जरूरियात पूरी करने के लिए रुपया पैसा खर्च करना अपनी बडभागता समझते हैं। वाजह हो कि त्याग व वैराग्य वही सच्चा व लाभदायक है जो दिल से हो ।अगर दिल में दुनियावी साज व सामान के लिए मोहब्बत व राग मौजूद है तो बाहरी त्याग व वैराग्य महज कपट की कार्रवाई है
।हाफिज ने खूब कहा है:- इस किस्म की मक्कारी से यह मुमकिन है कि कोई शख्स सौ पचास लोगों को अपना श्रद्धालु बना लें और उनसे सेवा व टहल कराके अपने दिन आराम से गुजारे लेकिन ऐसा शख्स सच्चे परमार के मार्ग पर कदम रखने के काबिल हरगिज ना होगा। बाज लोग कहते हैं कि रुपया पैसा छूने से बड़ा पाप लगता है इसलिए अभ्यासी पुरुषों को कभी चांदी सोने को हाथ नहीं लगाना चाहिए ।
हम पूछते हैं कि क्या पाप लगता है? सच्चे विरागी पुरुष के लिए सोना ,चांदी व मिट्टी एक समान है क्योंकि तीनों एक ही खानि से निकलती है और यकसाँ मुफीद है । क्या मिट्टी, लोहा, कांसा , पीतल किसी एक मालिक ने बनाए हैं और सोना ,चांदी दूसरे ने? यह सब के सब धातुएं उसी एक मालिक के इंतजाम से और एक ही पृथ्वी से प्राप्त होती है? अब जरा गौर करो कि रुपए पैसे क्या चीज है? ये महज चांदी ल ताबें के टुकड़े हैं जिन पर खास किस्म के नक्स वगैरा खुदे हैं और जिस हुकूमत ने उन्हें तैयार किया है उसके हुकुम से चीजों के खरीद-फरोख्त के सिलसिले में बतौर कीमत के लिए वह दिए जाते हैं
क्रमश:🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
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**परम गुरु हुजूर महाराज
- प्रेम पत्र -कल से आगे -(९ )
और जब सामान खुशी का मयस्सर आवे तब उसमें बहुत खुश न होवे और ना फूले, क्योंकि इसमें सुरत फैलती है। उस वक्त ऐसा ख्याल करें कि जो अपने मन को संभाले रखेगा तो उसके अभ्यास में खलल ना पड़ेगा, और नहीं तो मौज उनके मन को किसी न किसी तरह से दुखी करके संभालेगी ।ऐसा डर और ख्याल मन में रखकर अपनी संभाल करता रहे।।
(१०) जब कभी तबीयत बीमार होवे और तरह की तकलीफ होवे जिससे भजन और ध्यान में बैठ ना सके, तो जैसे बने लेटे-लेटे या बैठे-बैठे मन या चित्त से चरणों का सेवन करता रहे। जो इसका मन या चित्त चरणों में लगा रहेगा, तो वह बीमारी या तकलीफ इसको कम व्यापेगी, और जो ज्यादा बीमारी या तकलीफ में यह भी बन पडे तो मन से राधास्वामी नाम का सुमिरध ही करता रहे और संग संग थोड़ा बहुत ख्याल रखें। इस तरह से भी तकलीफ जरुर थोड़ी बहुत कम हो जाएगी ।
(११) और जहां तक बन सके किसी आदमी या जानवर या चीज में अपने चित्त का बंधन हद से ज्यादा ना करें , क्योंकि ज्यादा बंधन में दुख सुख ज्यादा भोगना पड़ता है और अपना ख्याल भी बिखरा हुआ रहता है और भजन या ध्यान में कम सिमटता है।
(१२) और हर एक के साथ जिनसे इसको काम पड़े जहां तक मुमकिन होवे मुलायमियत या दीनता या प्यार के साथ बरताव करें । सो मुलायमियत तो उनके साथ जो अपने से छोटे हैं, जो बराबर है उनके साथ प्यार और जो बड़े हैं उनके साथ दीनता।
(१३) और अपने मतलब के वास्ते किसी को ना दुखावे बल्कि जहां तक बन सके सुख पहुंचाना चाहिए ।और जो कोई ऊँच नीच तो जहां तक उसकी बर्दाश्त करें और किसी के साथ झगड़ा पैदा करें और जो अपना थोडा सा नुकसान भी होवे तो भी उसका सोच और ख्याल ना करें और अपनी तबीयत को झगडे बखेडे से और तकलीफ से बचाता रहे।
मंसा बाचा कर्मना, सबको सुख पहुँचाये। अपने मतलब कारने, दुख न दे तू काय।।
जो सुख नहीं तू दे सके, तो दुख काहू मत दे। ऐसी रहनी जो रहे, सोई शब्द रस ले।
।क्रमशः🙏🏻 राधास्वामी*🙏🏻*
: *राधास्वामी!!
06- 03- 2020 -
आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-
कल से आगे-( 76)-
रचना के शुरू में सिर्फ वही सुरते संसार में उतरी जिनका का रुझान या झुकाव माया की जानिब था । मायिक देश में आकर इन सुरतों को मायिक शरीर धारण करने पड़े और उनके द्वारा मायिक भोगों से संबंध कायम करके यही की हो रहीं। जब तक किसी सुरत का माया की जानिब झुकाव,जिसे आदिकर्म और काल का कर्जा भी कहते हैं, खत्म न हो जाए उसका माया के देश से छुटकारा नहीं हो सकता। सुरते आदि कर्म की वजह से संसार में आईं और यहां आकर उन्होंने अनेक स्थूल कर्म किये जिनका हिसाब इतना बढ़ गया कि कोई हद ना रही।इन स्थूल कर्मों की ही वजह से अनेक जीव नीच ऊँच योनियों में जन्म धारण करते हैं और संसार के दुख सुख सहते हैं । होते होते जब किसी जीव के स्थूल कर्म खात्मे पर आते हैं तो आदि कर्म का बेग फिर से अपना जोर दिखलाता है और वह जीव फिर अनेक स्थूल कर्म करता है जिनके खत्म होने पर फिर आदि कर्म के वेग की बारी आ जाती है ।
गर्जेकि जीव आदि कर्म व स्थूल कर्मों के चक्कर में फँसा है और उनका भुगतान होकर एक मरतबा शाखें कट जाती है तो जड़ से नया मसाला प्रकट होकर नई शाखें उत्पन्न हो जाती है इससे जाहिर है कि जीव का स्थूल कर्मों से छूटना इतना मुश्किल नहीं है ,असली मुश्किल काम आदि कर्म से छुटकारा हासिल करना है। आदि कर्म से सहज में छुटकारा हासिल करने के लिए किसी महापुरुष की खास दया व मेहर की जरूरत है । जब वे कृपा करके अपने चरणों की प्रीति बक्शीश फरमावे तो जीव का झुकाव माया के बजाय सच्चे मालिक की जानिब कायम हो। और अधिगम के वेग से हमेशा के लिए छुट्टी मिले, जैसा कि फरमाया है :- शब्द- सतगुरु प्यारे ने चुकाया, काल का कर्जा हो।टेक।। मैहर से मोहि सत्संग में खींचा। भक्ति पौद लगा गुरु सींचा।। कांटे विघन और हरजा हो।। दया गुरु परख बढत परतीती। सेव करत जागत नई प्रीति।। बढत मेरा दिन दिन दर्जा हो।। शब्द का मारग दीन लखाई।स्रुत मेरी धुन सँग दुन मिलाई । आज घट गगना गरजा हो।। भरम गुरु ने मेट दिये मेरे सारे । करम भी काट दिए अति भारे।। काल भी डर से लरजा हो।।। राधास्वामी कीन जगत उपकारा। चरण शरण दे जीव सवारा।। तार दई सब परजा हो।।
🙏🏻राधास्वामी 🙏🏻सत्संग के उपदेश भाग तीसरा*
परम गुरु हुज़ूर मेहताजी -भाग-2- (67 का शेष):-
इसके बाद हुज़ूर मेहताजी महाराज ने फ़रमाया- इन बचनों में दो बातें क़ाबिले ग़ौर हैं।
(1) साहबजी महाराज ने प्रथम यह फ़रमाया कि हर एक सतसंगी व ग़ैर सतसंगी के मुँह से यह शब्द ख़ुद ब ख़ुद निकलेंगे कि अगर एक घंटा और हुज़ूर राधास्वामी दयाल हमारी ख़बर नहीं लेंगे, तो हमारा ख़ात्मा हो जावेग। इससे आप अनुमान कर सकते हैं कि हुज़ूर राधास्वामी दयाल के ऊपर कैसी ज़िम्मेदारी का काम आ जाता है।
(2) देश में भारी संकट आने पर सभी लोग क्या सतसंगी और क्या ग़ैर सतसंगी इस क़दर घबरा जावेंगे कि हर एक के मुख से यही प्रार्थना निकलेगी कि हे मालिक! हमें बचाओ वरना कुछ ही समय में हमारा ख़ात्मा हो जायगा।
इनके अर्थ यह हैं कि मालिक उस समय देश के सतसंगी और ग़ैर सतसंगी सभी की तरफ़ आकृष्ट होगा और उनकी रक्षा व सँभाल करेगा और मदद करेगा
लेकिन ताज्जुब यह है कि जब बचन में यह पढ़ा गया कि हुज़ूर राधास्वामी दयाल सब लोगों की रक्षा करेंगे तो आप सब लोगों ने राधास्वामी के नारे से इस बचन का स्वागत किया लेकिन जब सतसंगियों की रक्षा होने के संबंध में आपके लाज़िमी फ़रायज़ का ज़िक्र आया तो आप सब लोग शांत रहे और किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। इसके मानी यह हैं कि आप लोग ख़ुद अपने कर्त्तव्यों को पूरा नहीं करना चाहते और अपनी रक्षा का सारा भार राधास्वामी दयाल पर डालना चाहते हैं। आप लोगों का यह तरीक़े अमल ग़लत है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि हर शख़्स अपनी ज़िम्मेवारी और कर्त्तव्य को तनदेही से पूरा करे। दूसरे यह कि सब मिल कर अपना सारा प्रबंध करें। तीसरे यह कि सब लोग एक दूसरे को बख़ुशी मदद देने को तैयार रहें। ऐसा करने से आप हुज़ूर राधास्वामी दयाल के काम को हल्का कर सकेंगे और फिर आप लोग उनकी रक्षा व सँभाल से लाभ उठा सकेंगे और वह रक्षा व सँभाल के प्रोग्राम को सहूलियत के साथ अमल में ला सकेंगे ।।
(68) -31 अक्टूबर, 1961 को शाम के सतसंग में हुज़ूर साहबजी महाराज के बचनों में से दो बचन (1) 4सितम्बर, 1920 बचन नम्बर 167 और (2) 13 सितम्बर, 1920 बचन नम्बर 175 पढ़े गये। पहले बचन में ज़िक्र है कि मुसीबत का ज़माना अब शुरू होने वाला है। इसका पूरा असर 30 या 35 साल में ज़रूर होगा।
दूसरे बचन में ज़िक्र है कि रगड़ और मुसीबत एक बार सतसंगियों पर भी आवेंगी लेकिन मालिक सतसंगियों की मदद करेगा इसलिए उनका बाल बाँका नहीं होगा ।ऐसे समय सतसंगियों को तीन बातों पर अमल करने से भारी मदद मिलेगी।
(1) यथाशक्ति सुमिरन, ध्यान, भजन करना।
(2) आपस में गहरा इत्तिफ़ाक और मुहब्बत रखना और मुसीबत में एक दूसरे की मदद करना।
(3) उस वक़्त पर अगर संत सतगुरु उनके पास मौजूद हों, तो उनकी, वरना Majority of Satsangis (सतसंगियों की अक्सरियत) की राय पर अमल करना और अपनी ज़ाती राय को अमल में न लाना है।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**
: **परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-
सतसंग के उपदेश भाग-2-(34)-
【धर्मशास्त्र और शरीअत】
:- जबकि दुनिया के हर हिस्से में तब्दीली व तरक्की का शोर मच रहा है। मुल्क हिंदुस्तान में धर्मशास्त्र व शरीअत के जमानों के लिए पुकार सुनाई देती है।
हिंदूसंगठन के प्रेमी पिछले युगो व मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र जी के जमाने के स्वपन देख रहे हैं और मुस्लिम संगठन के प्रेमी चौदह सौ वर्ष पुराने अरब देश के किस्से व कहानियां याद कर रहे हैं । यह कोई नहीं कहता कि धर्म शास्त्रों में जो शिक्षाएं वर्णन की गई हैं या पिछले युग में जो रिवाज मुल्क हिंदुस्तान में काम थे या अरब देश में इस्लाम की छोटी उम्र में जो शरीअत का कानून मुकर्रर हुआ वह एकदम गलत या नुकसान देह है बल्कि यह कहा जाता है कि प्राचीन बुजुर्गों ने जरूरीयाते वक्त व हालात गिर्दोपेश को ख्याल में रखकर जो नियम मुकर्रर किए उनकी मौजूदा जमाने में, जबकि दुनिया की काया पलट गई है और हिंदू हो या मुसलमान बिल्कुल नये हालात में जिंदगी बसर कर रहे हैं, हर्फ बहर्फ तामील कराना नादुरुस्त है। चुनांचे हिंदू भाइयों का यह उम्मीद करना कि हिंदुस्तान में वैदिक समय दोबारा प्रकट हो, सरासर गलत है क्योंकि अगर यह ज्ञान भी अगर यह मान भी लिया जाए कि वह जमाना दोबारा लौट आए तो ज्यादातर हिंदुओं को हरगिज़ पसंद न आएगा।
महात्मा बुध, कबीर, नानक व दीगर महापुरुषों की शिक्षा के प्रचार से हिंदू आवाम को बखूबी जेहननशीन हो गया है कि अपने पाप साफ कराने की तरफ से बेजुबान जानवरों का बलिदान करना सच्ची धार्मिक जिंदगी के नुक्ते निगाह से कतई नादुरुस्त व नामुनासिब है । इसी तरह राजाओं व अमीरों का सैकड़ों शादियां करना और उद्दालक ऋषि से पहले का या पांडवों का सा शादी का रिवाज दोबारा कायम करना सभ्यता के मौजूदि आदर्श के खिलाफ होने से हर्गिज़ सर्व साधारण को पंसद नही हो सकता।
इसलिए हिंदुओं के लिए मुनासिब यही है कि ऋषियों व मुनियों की तालीम से जमाने के हाल की जरुरियात के लिए जो कुछ भी मुफिदे मतलब मिले ग्रहण कर लिया जाए और बाकी बातें छोड दी जावें।
क्रमश: 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*
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**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-
रोजाना वाक्यात-
31 जुलाई 1932- रविवार:-
सेह पहर को हस्ब मामूल विद्यार्थियों का सत्संग हुआ । लड़कों से दरयाफ्त किया गया आया वह कोई खास मजहबी किताब पढ़ना पसंद करेंगे या जबानी लेक्चरों पर संतोष करेंगे? उन्होंने मजहबी किताब पढ़ना पसंद किया। पेश किया गया कि अगर वह चाहे तो कुरान शरीफ, इंजीत मुकद्दस, श्रीमद्भागवत गीता, सांख्य व योग दर्शन या बारह उपनिषदों में से कोई , या ड्रामा स्वराज्य या सत्संग की किताब में से कोई प्रारंभिक किताब पढ़ाई जा सकती है। एक लड़के ने कुरान शरीफ तजवीज किया 10- 12 लड़कों ने श्रीमद्भागवत गीता, लेकिन अधिक तादाद में अमृत बचन पसंद किया । बहुत से तर्क वितर्क के बाद यह तय हुआ कि कुरान शरीफ से कुछ है स्सा पढ़ा जावे। चुनांचे ख्वाजा हसन निजामी साहब का प्रदान किया हुआ अनुवाद मंगवाया गया। और कुल सूरत फातिहा व सूरत नूर का निस्फ हिस्सा पढ़ा गया । और बाकी अगले हफ्ते के लिए रख लिया गया। जहाँ तक मुमकिन हो सका मैने मजमीन पर रोशनी डाली। विद्यार्थियों ने लफ्ज लफ्ज कमाल शौक के साथ सुना। और जब उन्हें मालूम हुआ कि पैगंबर साहब कैसे स्पष्ट वादी ,समझौता वादी के हमदर्द और मालिक के आशिक थे और उन्हें जाहिलो के हाथ क्या क्या सितम उठाने पड़े तो अक्सरों के दिल भर आए। ख्वाजा साहब का प्रकाशित अनुवाद निहायत ही सुगम व प्रभावशाली है। आखिर में विद्यार्थीयों के दरख्वास्त करने पर अनुवाद उनकी हवालगी में दे दिया गया ताकि वह हफ्ता में वक्त निकालकर उससे अतिरिक्त फायदा उठा सकें।
रात के सत्संग में बयान हुआ कि वैसे तो सत्संग की खूब तरक्की हो रही है सैकड़ों नए आदमी हर माह भर्ती होते हैं लेकिन सत्संग की तरक्की का आदर्श लोगों की भीड़ भाड़ नहीं हो सकता । हमें यह देखना होगा आया काफी तादाद ऐसे भाई राधास्वामी दयाल और उनकी तालीम में सच्ची आस्था रखते हैं और उसे अमल में लाकर लाभान्वित हो रहे हैं । अगर सत्संग में ज्यादा तादाद ऐसे भाइयों की है जिन्हें बिना किसी खास वजह के यानी बिना किसी दुख या सुख का मौका होने के मालिक के दर्शन के लिए तड़प पैदा होती है और काफी तादाद ऐसे भाइयों की है जिनका चलते-फिरते और कामकाज करते ध्यान बनता रहता है और कुछ तादाद ऐसे भाइयों की है जो ऊंचे मकामात पर दर्शन हासिल करते हैं और कम से कम एक ऐसा भी सत्संगी है जिसका सीधा ताल्लुक कुल मालिक राधास्वामी दयाल हैं तो हमारा मजहब जिंदा है और हमारा सब मामला ठीक है । वरना जैसी और मजहबी संगठन ऐसी हमारी जमाअत । उसके बाद सच्चे सत्संग के मानी बयान हुए। लोग समझते हैं कि सत्संग के असली मानी सिर्फ कथा वार्ता या उफदेश देश है ।
सत्संग के असली मानी सत्तपुरुष का संग है और यह तब तब मुमकिन है जब हमारी संगत में कोई सत्तपुरुष हो और वह हमें अपने से ताल्लुक कायम करने का मौका दें और अपनी खास तवज्जह हमारी जानिब प्रवृत्त करें । बिना ऐसे पुरुष की मौजूदगी के सब कार्यवाही शुभ कर्म का फल देने वाली है । उससे कोई रूहानी लाभ हासिल नहीं हो सकता।
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
**परम गुरु हुजूर महाराज-
प्रेम पत्र -भाग 1 -(11)-
【 संत सतगुरु की महिमा और सुरत शब्द अभ्यास की बड़ाई】
:- सब लोग मालिक की तलाश में खोज करते हुए चले हैं, जिसको जहां तक का भेद मालूम हुआ उसी को उसने सिद्धांत समझा। और सच्चे मालिक का पता सिवाय संतों के किसी को नहीं मिला।
अक्सर लोग समझते हैं की प्राण की साधना से सच्ची मुक्ति हासिल हो सकती है और तीन लोक के मालिक का दर्शन मिल सकता है, लेकिन प्राण की साधना गृहस्थ जीवों से तो बिल्कुल नहीं हो सकती, क्योंकि उसके संजम यानी परहेज ऐसे हैं कि जब तक ग्रस्त घर बार और रोजगार को छोड़कर अलग ना हो जावे तब तक कुछ अभ्यास नहीं बन सकताऋ और फिर अभ्यास में जरा सी भी बदपरहेजी से खतरे बहुत है या तो कोई बीमारी ऐसी लग जावे की जन्म भर ना जावे या फौरन मृत्यु हो जाए। जब गृहस्थियों से अभ्यास न बन सका तो गोया बड़ा हिस्सा जीवो का तो उद्धार के काबिल नहीं हुआ। अब बिरक्त जो जवान है उनसे तो कुछ बन भी सकता है, पर वे भी उसके साथ और पैरों से लाचार होकर रह गए। और जो बूढ़े हैं उनसे बिल्कुल बन नहीं सकता।
जब परमार्थ का ऐसा हाल देखा तब जीव कर्म, धर्म, और मूरत पूजा और तीर्थ, व्रत वगैरह में लग गए और कोई कोई थोड़ी विद्या हासिल करके उसी में मगन हो गए । पर सच्चे मालिक का पता और सच्चे पद की प्राप्ति की जुगत किसी के हाथ नहीं लगी। कुल मालिक राधास्वामी दयाल ने जीवो के उद्धार का दरवाजा बंद देखकर आप संत सतगुरु रूप धारण कर संसार में आकर अपना निज भेद आप प्रगट किया।
क्रमश:🙏🏻 राधास्वामी**🙏🏻
: *राधास्वामी!!
08-03-2020
आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन
- कल का शेष:-
ऐसे पुरुष की अध्यायों के पालन के फल के बारे में हुजूर राधास्वामी दयाल का बचन है कि सच्चे सतगुरु की आज्ञा से जो कुछ काम जीव करता है वह उसे भक्ति का फल देने वाला होता है। भक्ति के अर्थ सच्चे मालिक के चरणो में सच्चा प्रेम है। यह प्रेम ही जीव के शुभ-अशुभ कर्मों और उसकी स्थूल व सूक्ष्म वासनाओं को साफ कर सकता है। इस प्रेम ही की सहायता से जीव अंतरी साधन करके अपनी सोई हुई आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत कर सकता है और आध्यात्मिक शक्तियों के जगने की ही से मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
इसलिए अगर किसी शख्स का मन सत्संग में शरीक होने पर भी रुखा फीका रहता है तो जाहिर है कि वह सतगुरु की आज्ञाओं का पालन नहीं करता और वह जितने कर्म करता है अपने मन की प्रेरणा से करता है और अपने शुभ कर्मों का फल सुख और मंद कर्मों का फल दुख भोगता है। इस बयान से जाहिर होना चाहिए कि अशुभ या मंद कर्मों के मुकाबले शुभ कर्म अच्छे हैं लेकिन मोक्ष के अभिलाषी के लिए दोनों प्रकार के कर्म व्यर्थ हैं ।।
🙏🏻राधास्वामी🙏🏻
(सत्संग के उपदेश भाग तीसरा)*
राधास्वामी दयाल की दया
राधास्वामी सहाय राधास्वामी
राधास्वामी।।।
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