प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा
*परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र- भाग 1- कल से आगे :-और वह निज भेद किसी मत की पुरानी किताबों में नहीं है ।शब्द की महिमा सब मजहबों में गाई है और उस शब्द की जुगत हिंदू और मुसलमानों के मजहब में थोड़ी बहुत बयान की है पर प्राण के रोकने के साथ ।इस सबब से वह जगह किसी बिरले से बन पड़ी, पर आम लोग उसकी कमाई ना कर सके और इस वास्ते उनका उद्धार या मुक्ति नहीं हुई। कुल मालिक ने सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में इस तरफ तवज्जो कम कि क्योंकि जब जीव माया के सामान के साथ खुश थे, यानी उस वक्त में लोग ऐसे दुखी ना थे जैसे कि अब रोग सोग और निर्धनता के सबब से दुखी हैं। और जब तक कोई दुख न होवे तब तक जीव को चेत नहीं होता। अब इस वक्त घोर यानि सख्त कलयुग में लोग दुखी और रोगी और चिंतित बहुत हैं। और माया के पदार्थों का विस्तार तो बहुत, मगर निर्धन लोग बहुत है। इस सबब से वह सामान माया का हाथ नहीं आता। और फिर उम्र भी कम हो गई है। ऐसी हालत देखकर कुल मालिक ने इस कलयुग में आप अवतार धडर कर अपने मिलने की जुगत ऐसी आसान कर दी जिसमें प्राण के रोकने की कुछ जरूरत नहीं और ऐसा अभ्यास बतलाया कि जो 100 वर्ष का बुड्ढा भी कर सके और 8 वर्ष का लड़का भी कर सके और हर उम्र के मर्द और औरत लेटे लेटे और बैठे बैठे कर सकते हैं । क्रमशः🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻*
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