प्रस्तुति - स्वामी शरण /आत्म स्वरूप
"बिना प्रेम के तो आदमी अपने से बाहर-बाहर ही भटकता है;अपने घर को उपलब्ध नहीं हो पाता।भीतर आने का एक ही द्वार है,वह है प्रेम।"
इस संसार में जो भी आता है अहंकार के कारण आता है अन्यथा आने की जरूरत नहीं।किसे आना है,जाना है?
विशाल चेतना के ही अनेक टुकडे होकर अहंकार का रुप धर लेते हैं।अब जब तक अहंकार दूर न हो चेतना तब तक अपने मूल स्वरुप को प्राप्त नहीं होती।
यहां तक तो ठीक है परंतु अहंकार इस तरह की चीज है जो मिटना नहीं जानती, न मिटना चाहती।बने रहने की उसकी शतप्रतिशत कोशिश रहती है।इससे सबसे बडा नुकसान यह होता है कि सुरक्षा की चाह हरदम बनी रहती है।यह संभव नहीं कि अहंकार भी हो और वह असुरक्षित रहना न चाहे।
यह उसकी मजबूरी है।अहंकार है तो सुरक्षा की मांग होगी ही।
क्या यह संभव है कि सुरक्षा हो,अहंकार न हो?बिल्कुल संभव है और यही सही रास्ता है।फिर वहां अहंकार नहीं होगा,समझ होगी।और समझ प्रेम से घिरी होगी।
जो आदमी चारों ओर से प्रेम से घिरा है वह सुरक्षित है।
आदमी अर्थात् चेतना।ऐसी चेतना जो प्रेम के किले में निवास करती है और प्रेम उसकी रक्षा करता है।
प्रेम में रहना, अपने आपमें रहना है।या कह सकते हैं जिसे अपने आपमें रहना है उसे प्रेम में रहना चाहिए।
आदमी अपने आपमें क्यों नहीं रहता?क्योंकि असुरक्षा का भय है।यह भय हमेशा बाहर ही रखता है,भीतर नहीं आने देता।भीतर आये तो सुख हो,भीतर आये तो शांति हो।एक ही चीज उसे भीतर रख सकती है जो है प्रेम का अहसास।दूसरे के प्रेम के भरोसे आदमी सुरक्षित रह ले लेता है फिर भी दूसरा,दूसरा ही है।किसीके प्रेम के भरोसे कब तक रहा जा सकता है?
प्रेम स्वयं का ही हो तो निश्चिंतता सुनिश्चित हो जाती है।होगी ही।ऐसा कौनसा प्रेमपूर्ण हृदय है जिसमें भयचिंता शंका का संचार संभव हो?असंभव है।
अब प्रेम कैसे हो?तो यह तो खुद को ही करना है।यह भाव करे कि मैं चारों ओर प्रेम से घिरा हूँ।
लोगों के प्रेम की कल्पना नहीं करनी है।उससे आश्वस्तता न आ पायेगी।हम जिस प्रेम की बात कर रहे हैं वह परमात्मा के स्वरुप की तरह जाना जाता है अर्थात् प्रेम परमात्मा का स्वरुप है।वह जो भी दिव्य चेतना है,दिव्य ऊर्जा है उसने सभी को चारों ओर से घेर रखा है जैसे हवा ने सभी को।बस।उस दिव्य चेतना को प्रेमभाव से भावित करना है।
जिसने हमें घेर रखा है वह प्रेम की शक्ति है।
जैसे जैसे यह भाव गहरायेगा प्रेम किले का रुप लेने लगेगा।
सभी प्रेमपूर्ण हृदय वाले सत्पुरुष उस अदृश्य किले में रहते हैं।वे अहंकाररहित होते हैं।न उन्हें असुरक्षा की फिक्र होती है।
प्रेम के किले में चेतना सुरक्षित होती है,अहंकार नहीं।क्योंकि यह किला स्वयं ही निर्मित करना होता है और यह अहंकार के बस के बाहर है।अहंकार की(मैं पन की)कोशिश तो रहती है कि प्रेम का किला निर्मित हो जाय लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।कोशिश वही करेगा।जैसे अंधकार, प्रकाश की व्यवस्था में जुट जाय।
हां कोई ऐसा भाग्यशाली हो जिस पर किसी महापुरुष का साया हो तो उसकी कृपाशक्ति का अनुभव होने पर रहा सहा अहंकार,अभिमान चला जाता है।यह सबसे आसान है।
या फिर मनुष्य ध्यान में इस तरह डूबे कि अहंकार पूरी तरह से मिट जाय।ध्यान का मुख्य उद्देश्य होता भी यही है अन्यथा किसे किसके लिए ध्यान करना है?
"The ending of the 'me' is part of meditation.That is the major, the only meditation."
जैसे कहा जाता है मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है वैसे ही कहा जा सकता है कि अहंकार ही मनुष्य के बंधन या मुक्ति का कारण है इस अर्थ में कि अहंकार है तो चेतना बंधन में है,अहंकार नहीं है तो चेतना मुक्त है।अहंकार का झुकना ही बडी बात है।किसीको दंडवतप्रणाम करने से अहंकार में कमी आती है।
स्वयं ही चेतना, स्वयं ही अहंकार।स्वयं झुके तो स्वयं मुक्त हो।अहंकार झुकना चाहता नहीं।इससे धोखा उत्पन्न होता है।धोखा समझ में आ जाय तो सिर दिनभर दंडवतप्रणाम ही करता रहे।
फिर अहंकार का क्या काम?फिर अहंकार का कैसा असुरक्षा भय?
यह जो प्रेम के किले की बात हो रही है यह अहंकार की सुरक्षा की मांग को लेकर है अन्यथा किलेबंदी की जरूरत नहीं।यह अहंकार ही है जो सुरक्षा की बाड बनाकर रहना चाहता है।
तो कहा जाता है प्रेम की बाड बनाकर रहो।फिर बाड की भी जरूरत न रहेगी।प्रेम को किस बाड की आवश्यकता?यह तो अहंकार है उसे बाड चाहिए ताकि निश्चिंतता बनी रहे।अनिश्चितता का जीवन किसी को भी प्रिय नहीं।सभी को निश्चितता चाहिए।सभी लोग सुरक्षा को सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं।फिर भी खतरा दीखे तो चिंता हो जाती है।यही अहंकार है।
मूलतः आदमी अहंकार है क्या?
नहीं।अहंकार,चेतना पर आया आवरण है।चेतना मूल है,अहंकार नहीं।
अब स्वयं को चेतना की तरह कौन जाने?सब स्वयं को अहंकार की तरह जानते हैं अर्थात् आवरण की तरह।फिर तो भ्रम ही भ्रम है।वहां सत्य का प्रकाश अनुपस्थित है।
अहंकार को सुरक्षा चाहिए परंतु मूल में चेतना है अतः आदमी को यह बात समझ में आ सकती है कि-
"बिना प्रेम के आदमी अपने से बाहर ही बाहर भटकता है;अपने घर को उपलब्ध नहीं हो पाता।भीतर आने का एक ही द्वार है,वह है प्रेम।"
ऐसा आदमी प्रेमकर्ता नहीं होता अपितु प्रेम के अनुभव में स्थित होता है।जब तक कर्ता है तब तक अहंकार है।जब तक अहंकार सुरक्षा के लिए प्रेम का इस्तेमाल करता है वह असुरक्षित ही रहता है।
असली सुरक्षा तभी है जब प्रेमकर्ता अहंकार पूरी तरह से अनुपस्थित होता है।इसलिए प्रेम परमात्मा का स्वरुप है ऐसा कहना ठीक ही है।
अन्य तरीके से कह सकते हैं जब मैं प्रेम के द्वार से परमात्मा में प्रवेश करता हूं तब मैं मिट जाता हूं,परमात्मा रह जाते हैं,प्रेम रह जाता है।
इस अवस्था के लिए कहा है-
जब "मैं" था तब हरि नहीं, अब हरि हैं "मैं" नाहीं।
प्रेमगली अति सांकरी तामें दो न समाहीं।।
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