Wednesday, March 11, 2020

सत्संग के मिश्रित बचन उपदेश और प्रसंग




प्रस्तुति - उषा रानी /
 राजेंद्र प्रसाद सिन्हा

**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज- रोजाना वाक्यात- 01 अगस्त 1932
- सोमवार-

 पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट के अफसरान डेरी का फिल्म उतारने के लिए आ गए हैं। तैयारी हो रही है। 30000 कैंडल पावर के बल्बों का बंदोबस्त किया गया है ।।                     तेलुगु भाइयों की सहूलियत के लिए 7 जुलाई से तेलुगु जबान की पहली किताब का अध्ययन शुरू किया था। आज किताब खत्म हो गई। हफ्ता 10 दिन के अंदर उसे दोहरा कर दूसरी किताब शुरू करने का इरादा है । इस मर्तबा मद्रास के दौरे में मेरे तेलगु ने जानने से और वहां के लोगों के हिंदी न जानने से बड़ी तकलीफ रही। उम्मीद है कि दया से 1 साल मेहनत करने का करने पर आइंदा के लिए सहूलियत हो जाएगी। क्योंकि इधर में तेलुगु सीखने के लिए कोशिश कर रहा हूं और उधर बीसों भाई व बहने  हिंदी सीखने की कोशिश में लगे हैं।।                                रात के सत्संग में जिला आजमगढ़ के एक सन्यासी साहब से बातचीत हुई ।अच्छे पढ़े-लिखे हैं । 10 उपनिषद , गीता वगैरह खूब समझते हैं। मैनें दरयाफ्त याद किया यह जो गीता में आया है कि सन्यास व योग का फल एक ही है क्या इसके मानी है कि जो फल सन्यास का है वही योग का है और जो योग का है वही सन्यास का है या यह कि सन्यास का फल योग है योग में है लेकिन योग का फल साधारण सन्यास में नहीं है । आपने प्रथम व ने जवाब दिया।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


[11/03, 03:11] +91 97830 60206:

*परम गुरु हुजूर महाराज-

 प्रेम पत्र- भाग 1- कल से आगे :

-और वह निज भेद किसी मत की पुरानी किताबों में नहीं है ।शब्द की महिमा सब मजहबों में गाई है और  उस शब्द की जुगत हिंदू और मुसलमानों के मजहब में थोड़ी बहुत बयान की है पर प्राण के रोकने के साथ ।इस सबब से वह जगह किसी बिरले से बन पड़ी, पर आम लोग उसकी कमाई ना कर सके और इस वास्ते उनका उद्धार या मुक्ति नहीं हुई। कुल मालिक ने सतयुग, त्रेता और द्वापर युग में इस तरफ तवज्जो कम कि क्योंकि जब जीव माया के सामान के साथ खुश थे, यानी उस वक्त में लोग ऐसे दुखी ना थे जैसे कि अब रोग सोग और निर्धनता के सबब से दुखी हैं। और जब तक कोई दुख न होवे तब तक जीव को चेत नहीं होता। अब इस वक्त घोर यानि सख्त कलयुग में लोग दुखी और रोगी और चिंतित बहुत हैं। और माया के पदार्थों का विस्तार तो बहुत, मगर निर्धन लोग बहुत है। इस सबब से वह सामान माया का हाथ नहीं आता। और फिर उम्र भी कम हो गई है। ऐसी हालत देखकर कुल मालिक ने इस कलयुग में आप अवतार धडर कर अपने मिलने की जुगत ऐसी आसान कर दी जिसमें प्राण के रोकने की कुछ जरूरत नहीं और ऐसा अभ्यास बतलाया कि जो 100 वर्ष का बुड्ढा भी कर सके और 8 वर्ष का लड़का भी कर सके और हर उम्र के मर्द और औरत लेटे लेटे और बैठे बैठे कर सकते हैं ।

क्रमशः

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻*


[11/03, 03:11] +91 97830 60206:

*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

- सतसंग के उपदेश -भाग 2

- कल का शेष:

- इसी तरह मुसलमान भाइयों को शरीअत के कायदो का ऐसा ही इस्तेमाल करना चाहिए । जिन लोगों ने मौलाना आजाद की "दरबार- ए -अकबरी" को पढ़ा है उन्हें बखूबी मालूम होगा कि मुल्लाओं ने शरीयतपरस्ती पर जोर देकर किस तरह अकबर बादशाह को परेशान कर दिया था। उसका अक्लमंद शहंशाह ने खुदमतलबियों की चालाकियां ताडकर पक्का इरादा किया कि हमेशा के लिए उनका जोर तोड़ दे। मुल्लाओं ने भी ईरान व अफगानिस्तान के आलिमों से मदद हासिल करके अकबर बादशाह को तख्त से उतारने के मंसूबे बांधे लेकिन खुशकिस्मती से अबुलफजल व शेख मुबारक अकबर बादशाह के मददगार बन गए और नतीजा यह महिलाओं को शिकस्त खानी पड़ी और अकबर बादशाह अपनी जमीर के मुताबिक शरीअत के अर्थ करने का अधिकारी हो गया। ख्याल किया जा सकता है कि अकबर की हुकूमत और हिंदुस्तान के सल्तनत का क्या हाल होता है अगर अकबर तंगदिल मुल्लाओं के कहने में चलता रहता ह?  हालही की मिसाल लीजिये- तुर्की ने, जो खिलाफत का गढ था,  इस प्राचीन संस्था का एकदम सफाया कर दिया और पुशतैनी शादी के  रिवाज व पर्दे को पल भर में उड़ा दिया। तज्जुब है कि तुर्की के रहने वालों से शरीअत के कवानीन की ऐसी  खुल्लम-खुल्ला खिलाफवर्जी के लिए कोई नहीं पूछता बल्कि हर कोई कमालपाशा कि इन कार्यवाहियों की प्रशंसा करता है। अगर हिंदू और मुसलमान भाई पक्षपात छोड़कर जमाने के हालात के बमूजिब धर्मशास्त्रों व शरीअत के मानी लगाने लगे तो नामुमकिन नहीं है कि हर दो दोनों ना सिर्फ बिरादराना तौर से रहने लगें बल्कि व पैगंबर साहब की तालीम की स्प्रिट के बमुजिब सच्ची धार्मिक जिंदगी बसर कर सकें।

।🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**


[11/03, 14:07] +91 94162 65214:


*राधास्वामी!! 11-03 -2020

आज शाम के सत्संग में पढ़ा गया बचन-

परसों से आगे-( 79)

 जो लोग मालिक की हस्ती में विश्वास रखते हैं लेकिन परमार्थ की काफी समझ बूझ नहीं रखते, अक्सर 2 गलतियां करते हैं । एक यह कि वे ख्याल करने लगते हैं कि मालिक से मिलना या अंतरी संबंध कायम करना निहायत आसान है और दूसरे यह कि यह मानकर कि मनुष्य- शरीर रचना भर में सबसे उत्तम शरीर है वे इसी शरीर में रहना पसंद करते हैं । जैसे गर्मी के महीनों में पिघली हुई बर्फ के पानी यानी गंगा जल में गोता मारकर शीतल व प्रफुल्लित होने पर भोले भाले यात्री ख्याल करते हैं कि गंगाजी ने उनके सब पाप धो डाले, ऐसे ही ये लोग जब तब अंतर में जरा सी बिरह या तडप पैदा हो कर आँखों मे आँसू व कलेजे में ठंडक आ जाने पर विश्वास करते हैं कि उन्हे मालिक से मेल और मनुष्य शरीर का पूर्ण लाभ प्राप्त हो गया।

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻

( सत्संग के उपदेश- भाग तीसरा)*







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