प्रस्तुति- अनिल कुमार चंचल
**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
- रोजाना वाक्यात- 2, 3 अगस्त 1932-
मंगलवार, बुधवार:
- 2 अगस्त को दिनभर दयालबाग में उत्सव रहा। तीसरे पहर कुश्तियां और गटके का खेल हुआ। जब बाजीगर अपनी बाजी दिखलाने लगे एकदम जोर की बारिश आ गई और सब आटा गीला हो गया।।
3 अगस्त को कर्नल डन तशरीफ लाए और डेरी की अनेक आंशिक फिल्म ले गए। कर्नल डन की इस मेहरबानी से हमारी डेरी पब्लिक की निगाह में आ जाएगी । डेरी की कलें और डेरी के इंतजामात देखकर सामान्य जन को लाभप्रद सबक हासिल होगा और डेरी का कारखाना आवाम की निगाह में चढ जाने से कारखाने की तरक्की होगी। आज दिन भर बारिश होती रही। सावन का महीना पूरे जोरों पर हैं चारों तरफ घटाएं छा रही है और टप टप बूंदे बरस रही है। जिधर देखों हरियाली ही हरियाली नजर आती है।किसों और कहानियों में वृन्दावन की जो तारीफ पढ़ने में आती है
इन दिनों दयालबाग में प्रकट दिखलाई देती है।। सुबह कॉरेस्पॉन्डेंस के वक्त सन्यासी साहब से बातचीत हुई ।ताज्जुब कि लोग यह कहने की हिम्मत रखते है कि कारण व कारज यानी कारण व कारज एक हो सकते हैं। एक अर्से के बाद यह करार पाया कि कारण व कारज दो चीजें हैं। कारण पहले होता है कारज पीछे।और यह कि संस्कार व वासना में फर्क है।
संस्कार से बासनायें पैदा होती है संस्कार कारण है और बासनायें कारज। मेरी राय में यह सब कमियां इल्म की जाती है। कमी की वजह से पैदा होती है और अक्ल की कमी की वजह से पैदा होती है। अक्ल की कमी रहते हुए इल्म का वही हाल होता है जो नादान बच्चे के हाथ में हीरे व लाल का ।।
सन्यासी साहब कहने लगे कि सूक्ष्म दृष्टि के कारण व कारज एक ही होते हैं क्योंकि सांखयमत यह है कि कारज कारण के अंदर गुप्त तरीके से मौजूद रहता है । जवाब में कहा गया कि कारण के अंदर मौजूद नहीं रहता बल्कि कारज के प्रकट होने और कारज के रूप के मुतालिक इंतजाम उसके अंदर रहता है। मसलन बीज के अंदर दरख्त मौजूद नहीं रहता अलबत्ता दरख्त का रूप प्रकट किये जाने का इंतजाम रहता है। और अगर सूक्ष्म दृष्टि इस्तेमाल की जावे तो न कारण रहे न कारज,.न बीज रहे न दरख्त। सांख्य मतानुसार सिर्फ पुरूष व प्रकृति रह जाते है उस हालत में सब बातचीत बंद हो जाती है।
बातचीत अभी जारी रह सकती है जब सूक्ष्म दृष्टि छोड़कर और पव्यवहारिक सत्यता पर निगाह रखी जावे आखिर में सन्यासी साहब ने यह बात मंजूर कर ली और बहस खत्म हुई।
🙏🏻 राधास्वामी*🙏🏻
*परम गुरु हुजूर महाराज- प्रेम पत्र- भाग-1-
कल से आगे:-
अब समझना चाहिए कि आदमी का रुप चित्त यानी तवज्जह है। जहाँ जिस का चित्त है, वही वह आप मौजूद है। जब किसी का चित्त है, वही वह आप मौजूद है। जब किसी ने भैद लेकर अपनी पूरी तवज्जह कुल मालिक के चरणों में लगाई तो वह उस वक्त वहीं यानी चरणों में मौजूद है और वही शब्द भी मौजूद है। शरीर जहाँ पडा है वही पडा है। आँख इंद्री से दृष्टि बाहर की तरफ जाती है और सूरतों को देखती है और कान के वसीले से बाहर का शब्द सुना जाता है। और जब कि आँख और कान दोनों बंद करके और अंतर का भेद लेकर तवज्जह चरणों में लगाई, तो जो आवाज आसमानी अंतर में हो रही है और हर वक्त जिसकी धार जारी है वह आसानी से सुनने में आ सकती है और मालिक के नूर का जलवा भी दिखलाई दे सकता है। और इसी आवाज को पकड के सुरत दर्जे बदर्जे ऊपर को चढ कर एक दिन राधास्वामी के चरणों में पहुँच सकती है। जितने रास्ते में ठेके या स्थान है उसी कदर शब्द भी है। उनका भेद संत सतगुरु या उनके साध या खास सतसंगी से मिल सकता है।
संत सतगुरु खास मालिक का अवतार है क्या उसके खास पास रहने वाले हैं और कभी उससे जुदा नहीं रहते। अगर थोड़ी देर के बाद से जुदा भी दिखलाई देते हैं तो सिर्फ जीवो के उपकार के वास्ते, मगर असल में वे हैं कभी जुदा नहीं होते। हर हालत में इधर भी है और उधर भी है यानी उनकी सुरत की डोरी थोड़ी बहुत हर वक्त चरणों में कुल मालिक के लगी रहती है। सिवाय उनके या उनके साथ या खास सत्संगी के कुल मालिक और उसके दाम का भेद कोई नहीं दे सकता है और सुरत और शब्द का दरसना खोजी और दर्दी परमार्थी को, इस तौर पर कि उसके चित्त में बचन पूरी तरह समा जावे और तसल्ली हो जावे दूसरा नहीं कर सकता
।क्रमशः🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
म गुरु हुजूर साहबजी महाराज
- सत्संग के उपदेश- भाग 2-( 35)-
【 दुनिया का दुख कैसे मिटे?】
हाफिज ने अपने गजल में कहा है:-" दुनिया में यह क्या शोर मच रहा है, तमाम संसार लड़ाई झगड़ों से भरपूर है। भाई को भाई के साथ कोई मोहब्बत नहीं और बाप को बेटे के लिए कोई प्रेम नहीं । हर शख्स जमाने से उन्नति और वृद्धि की आशा करता है लेकिन मुश्किल यह है कि दिन बदिन हालत बदतर ही नमूदार हो रही है। लड़कियों की मांओं के साथ जंग जारी है और लड़के बापों के बदख्वखह नजर आते हैं। मूर्ख गुलाब व शहद के शरबत उड़ाते हैं और बुद्धिमान जिगर का खून पीकर दिन काटते हैं। दुनिया से कोई शख्स बेहतरी की उम्मीद ना करें क्योंकि यहां जो नया दिन चढ़ता है वह पिछले दिन से बदतर ही देखने में आता है।क्ष यहां का यही हाल है कि बेशकीमत व सवारी के अरबी घोड़े गदहो की तरह लादे जाते हैं और जख्म पर जख्म खाते हैं और गधों की गर्दनों में सुनहरे हार पहनाये जाते हैं। ऐ ख्वाजा! हाफिज की नसीहत सुनो- जहां तक हो सके अपनी तरफ से नेकी करों (तेरी इसी में भलाई है ) यह नसीहत जवाहरात से भी बेशकीमती है ।"
इस ग़ज़ल के मजमून पर गौर करने से मालूम होता है कि जो कुछ कैफियत फिसाद व झगड़े की मौजूदा जमाने में नजर आती है कोई नई बात नहीं है । हाफिज के जमाने में यानी कम से कम 600 वर्ष पहले भी दुनिया का ऐसा ही हाल था । इसके सिवा महाभारत या रामायण से प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों का मुताला करने से भी यही नतीजा निकलता है कि इस दुनिया में लड़ाई झगड़ा , लोभ लालच व ईर्ष्या विरोध का दौर पिछले युगों में भी जारी रहा । इंजील की रवायत रू से तो सृष्टि के आदि से भी बुरे अंगों का वजूद कायम है क्योंकि हजरत आदम के बेटे 'केन' ने अपने भाई 'एबिल' को इन अंगों की वजह से कत्ल किया । यह मुमकिन है कि यह शहादतें लफ्ज़ बलफ्ज़ दुरुस्त ना हो लेकिन इनसे बेहतर इस कदर जरुर पता चलता है कि हमेशा से अच्छे स्वभाव वाले व सदा सीधे सादे लोग नाकिस अंगों में बरतने वाले मनुष्यों की शिकायतें करते रहे हैं इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अगर मौजूदा जमाने में मुख्तलिफ मुल्कों,कौमों व सोसायटीयों के अंदर उनके शिकायतें सुनने में आवें।
क्रमश:
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
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