**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
-रोजाना वाकिआत-
कल का शेष -
"हजरत मसीह मौऊद अले उल सल्वातो अल सलाम(एक.सम्बोधन) ने अपने आप को दो लटो वाला भी लिखा है जिसके मुतअल्लिक़ कुरान करीम में आता है कि उसने कहा -ऐ लोगों अगर बड़े कानो वाले दानवों की दो जातियाँ सुरक्षित रहना चाहते हो तो मुझे माल दो ताकि मैं एक दीवार तुम्हारी हिफाजत के लिए बना दूँ ।
गोया कुरान मजीद से यह साबित होता है कि मसीह मौऊद खुद का काम चंदा लेना है। सिलसिले कर जरूरियात को आप लोग खूब जानते हैं । प्रचार प्रसार और दूसरे कामों का दारोमदार रुपए पर है । और अगर आप के चंदा न देने की सुस्ती से उसमें हर्ज होता है तो आप अल्लाह ताला के काम में हर्ज करने वाले हैं " वगैरह।
सत्संग में चंदा का रवाज कतई नही है। किसी की मर्जी हो रुपया दे, ना हो न दे। क्योंकि हम लोगों का विश्वास है कि मालिक के काम के पैसे से नहीं चलते । दुनिया के काम चलाने के लिए अलबत्ता रुपए की जरूरत है।
हमें जमाअत का बुजुर्ग अपनी जरूरीयात को सबसे बेहतर समझता है और उसे पूरा अख्तियार है कि जिन अल्फाज में मुनासिब समझेअपने अनुयायियों को हिदायत करें। बाहरी आदमी को दखल देने की कतई इजाजत नहीं है। सवाल सिर्फ इस कदर है आया सत्संग में चंदा का रवाज ना होने की वजह से तो यह ख्याल नहीं फरमा लिया गया कि सत्संग में "रूहानियत खाक नहीं है"। रात के सत्संग अजमेर के भाइयों ने दरख्वास्त पेश की कि माह फरवरी आयन्दा में सत्संग का दौरा अजमेर में हो। वहां आठ दस दिन कायम रहे और नुमाइश लिए भी बंदोबस्त किया जाए। मालूम होता है कि पटना के हालात सुनकर इन भाइयों के दिलों में ने जोश उठाया है।
मैंने नुमाइश के मुतअल्लिक़ तकलीफात और सतसंगियों के कयाम के मुतअल्लिक़ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का ख्याल दिलाया। लेकिन अजमेरी भाइयों ने यकीन दिलाया कि इन सब तथ्यों पर गौर कर लिया गया है। अंततः फैसला हुआ कि अव्वल अजमेरी भाई एक मजबूत नुमाइश कमेटी कायम करें और कोई मौजूँ शख्स उद्घाटन संबंधी रस्म के लिए चयन करें बाद में दरख्वास्त पर गौर किया जाएगा।
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
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