**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-
【 संसार चक्र 】
कल से आगे
:-तीसरा नौजवान-( खड़े हो कर ) आज्ञा हो तो मैं भी कुछ पूछूं ।
महात्मा -जरूर ,आप भी पूछिये।
तीसरा नौजवान- मैं यह पूछता हूँ- मन क्या चीज है? आप में से किसी ने मन देखा, सुना, सूँघा या चक्खा है? क्या कोई इंकार कर सकता है कि मन का ज्ञान इंसान को ज्ञानेंद्रियों द्वारा नहीं होता है? आपने घोड़े का सिर देखा है, पीठ देखी है, टाँगे देखी ह लेकिन घोड़ा आपने मन के अनेक भाव-क्रोध,लोभ,मोह वगैरह जुदा-जुदा अनुभव किये पर आपने मन का कभी भी अनुभव नहीं किया। अगर अनुभव ना होने से परमात्मा और स्थूल जगत् से इनकार हो सकता है तो मन की हस्ती से क्यों इंकार नहीं हो सकता?
( मजमे में खलबली मच जाती है, बहुत से लोग तालियाँ बजाने लगते हैं और " खूब कही " खूब कही" का शोर मच जाता है।)
दुलारेलाल-( खड़े हो कर ) इस शास्त्रार्थ से तो यह नतीजा निकला इंसान को ना तो परमात्मा का पता चल सकता है न आत्मा का, न मन का ज्ञान हो सकता है न स्थूल जगत् का। फिर क्या लाभ इस कथा से और क्या लाभ शास्त्र बिचारने से? सचमुच दुनिया दीवानी ही है ।।
महात्मा- शांति शांति!
(मजमा चुप हो जाता है।)
चौथा नौजवान-(खड़े हो कर) महाराज मेरी भी सुनो- यह जो पढ़ना गुनना है , यह भी निरा घास छीलना ही है
(सब लोग जोर से हंस पड़ते हैं।)
भाइयों ! पहले मेरी सुन लो, पीछे हँसना। जितनी विद्याएँ है करीबन् सबका आधार यही एक सिद्धांत है कि दुनिया में अनेक नियम या कायदे बर्त रहे हैं; और आप में से किसी ने नियम देखें? आपने यह होते देखा और वह होते देखा और झट से नतीजा निकाल लिया कि इन दोनों घटनाओं में परस्पर कारण- कार्य संबंध है। जहाँ सौ पचास मर्तबा दो बातों को आगे पीछे होते देख लिया, फिर क्या था? लगे कहने-" ऐसा होना तो सृष्टनियम है।" किसी के पास यह कहने के लिए क्या सबूत है कि हमेशा किसी कारण से कोई कार्य जरूर ही होना चाहिए? आप सिर्फ मान लेते हैं और ऐसा मानना सरहीन् आपके दिमाग की गूँथा गाँथी है ! इसलिए फेकू इन पुस्तकों को और छोड़ो पढ़ने पढ़ाने को ।
(लोग -अरे) विद्या पढ़ पढ कर लोग चालाक ही बन जाते हैं, सुखी तो नहीं होते?
( लोग सच है, सच है।)
जहां परमात्मा और आत्मा जगत् और मन गये वहीं भेजो इन पुस्तकों को इनके पढ़ने गुनने को।
( सब लोग चुप हो जाते हैं, सन्नाटा छा जाता है।)
क्रमशः
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
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