Friday, July 10, 2020

रोजाना wakyat, संसार चक्र और प्रेम पत्र





**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज

 -रोजाना वाकिआत-

कल का शेष -

"हजरत मसीह मौऊद अले उल सल्वातो अल सलाम(एक.सम्बोधन) ने अपने आप को दो लटो वाला भी लिखा है जिसके मुतअल्लिक़ कुरान करीम में आता है कि उसने कहा -ऐ लोगों अगर बड़े कानो वाले दानवों की दो जातियाँ सुरक्षित रहना चाहते हो तो मुझे माल दो ताकि मैं एक दीवार तुम्हारी हिफाजत के लिए बना दूँ ।

गोया कुरान मजीद से यह साबित होता है कि मसीह मौऊद खुद का काम चंदा लेना है।  सिलसिले कर जरूरियात को आप लोग खूब जानते हैं । प्रचार प्रसार और दूसरे कामों का दारोमदार रुपए पर है । और अगर आप के चंदा न देने की सुस्ती से उसमें हर्ज होता है तो आप अल्लाह ताला के काम में हर्ज करने वाले हैं " वगैरह।

                                 

सत्संग में चंदा का रवाज कतई नही है। किसी की मर्जी हो रुपया दे, ना हो न दे। क्योंकि हम लोगों का विश्वास है कि मालिक के काम के पैसे से नहीं चलते । दुनिया के काम चलाने के लिए अलबत्ता रुपए की जरूरत है।

हमें जमाअत का बुजुर्ग अपनी जरूरीयात को सबसे बेहतर समझता है और उसे पूरा अख्तियार है कि जिन अल्फाज में मुनासिब समझेअपने अनुयायियों को हिदायत करें। बाहरी आदमी को दखल देने की कतई इजाजत नहीं है। सवाल सिर्फ इस कदर है आया सत्संग में चंदा का रवाज ना होने की वजह से तो यह ख्याल नहीं फरमा लिया गया कि सत्संग में "रूहानियत खाक नहीं है"।                                                          रात के सत्संग अजमेर के भाइयों ने दरख्वास्त पेश की कि माह फरवरी आयन्दा में सत्संग का दौरा अजमेर में हो। वहां आठ दस दिन कायम रहे और नुमाइश लिए भी बंदोबस्त किया जाए। मालूम होता है कि पटना के हालात सुनकर इन भाइयों के दिलों में ने जोश उठाया है।

 मैंने नुमाइश के मुतअल्लिक़ तकलीफात और सतसंगियों के कयाम के मुतअल्लिक़ महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का ख्याल दिलाया। लेकिन अजमेरी भाइयों ने यकीन दिलाया कि इन सब तथ्यों पर गौर कर लिया गया है। अंततः फैसला हुआ कि अव्वल अजमेरी भाई एक मजबूत नुमाइश कमेटी कायम करें और कोई मौजूँ शख्स उद्घाटन संबंधी रस्म के लिए चयन करें बाद में दरख्वास्त पर गौर किया जाएगा।       

 🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**





**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-

【 संसार चक्र 】

कल से आगे

:-तीसरा नौजवान-( खड़े हो कर ) आज्ञा हो तो मैं भी कुछ पूछूं ।
महात्मा -जरूर ,आप भी पूछिये।

तीसरा नौजवान- मैं यह पूछता हूँ- मन क्या चीज है? आप में से किसी ने मन देखा, सुना, सूँघा या चक्खा है? क्या कोई इंकार कर सकता है कि मन का ज्ञान इंसान को ज्ञानेंद्रियों द्वारा नहीं होता है? आपने घोड़े का सिर देखा है, पीठ देखी है, टाँगे देखी ह लेकिन घोड़ा आपने मन के अनेक भाव-क्रोध,लोभ,मोह वगैरह जुदा-जुदा अनुभव किये पर आपने मन का कभी भी अनुभव नहीं किया। अगर अनुभव ना होने से परमात्मा और स्थूल जगत् से इनकार हो सकता है तो मन की हस्ती से क्यों इंकार नहीं हो सकता?

( मजमे में खलबली मच जाती है, बहुत से लोग तालियाँ बजाने लगते हैं और " खूब कही " खूब कही" का शोर मच जाता है।)

  दुलारेलाल-( खड़े हो कर ) इस शास्त्रार्थ से तो यह नतीजा निकला इंसान को ना तो परमात्मा का पता चल सकता है न आत्मा का, न मन का ज्ञान हो सकता है न स्थूल जगत् का। फिर क्या लाभ इस कथा से और क्या लाभ शास्त्र बिचारने से? सचमुच दुनिया दीवानी ही है ।। 

                 
महात्मा- शांति शांति!

 (मजमा चुप हो जाता है।)

चौथा नौजवान-(खड़े हो कर) महाराज मेरी भी सुनो- यह जो पढ़ना गुनना है , यह भी निरा घास छीलना ही है

(सब लोग जोर से हंस पड़ते हैं।)
   भाइयों ! पहले मेरी सुन लो, पीछे हँसना। जितनी विद्याएँ है करीबन् सबका आधार यही एक सिद्धांत है कि दुनिया में अनेक नियम या कायदे बर्त रहे हैं; और आप में से किसी ने नियम देखें? आपने यह होते देखा और वह होते देखा और झट से नतीजा निकाल लिया कि इन दोनों घटनाओं में परस्पर कारण- कार्य संबंध है। जहाँ सौ पचास मर्तबा दो बातों को आगे पीछे होते देख लिया, फिर क्या था?  लगे कहने-" ऐसा होना तो सृष्टनियम है।" किसी के पास यह कहने के लिए क्या सबूत है कि हमेशा किसी कारण से कोई कार्य जरूर ही होना चाहिए?  आप सिर्फ मान लेते हैं और ऐसा मानना सरहीन् आपके दिमाग की गूँथा गाँथी है ! इसलिए फेकू इन पुस्तकों को और छोड़ो पढ़ने पढ़ाने को ।

(लोग -अरे) विद्या पढ़ पढ कर लोग चालाक ही बन जाते हैं, सुखी तो नहीं होते?

( लोग सच है, सच है।)

जहां परमात्मा और आत्मा जगत् और मन गये वहीं भेजो इन पुस्तकों को इनके पढ़ने गुनने को।

( सब लोग चुप हो जाते हैं, सन्नाटा छा जाता है।)

 क्रमशः                               
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**





**परम गुरु हुजूर महाराज-


प्रेम पत्र -भाग 1- कल से आगे-( 27)-


【 जवाब थोड़े से सवालों के जो एक सत्संगी ने भेजें】


-(1)  सत्पुरुष से जोत और निरंजन दो कला प्रगट हुई ।और यह दोनों कला चैतन्य हैं और इन्होंने तीन लोक की रचना करी, पहले ब्रह्म सृष्टि और बाद उसके और किस्म की रचना, यानी सुर,नर और चारों खान और यह रचना तीन धारों से प्रकट हुई और एक तीन धारे ब्रह्म और माया से, मुकाम सहसदलकँवल  से, निकली और वह तीन गुण कहलाती है।


सहदलकवँल तक माया चैतन्य और निहायत  लतीफ है, सहसदलकँवल और तीन गुणों के मंडल के नीचे जड़ता शुरू हुई और जिस कदर उतार नीचे होता गया स्थूलता यानी जड़ता बढ़ती गई। सबब इसका यह है कि सतलोक तक निर्मल चेतन देश है और उसके नीचे हल्की खोल चैतन्य पर थी।सो जब ऊपर से धार आई , उसने उस खोल को और निर्मल चेतन को जुदा करके रचना करी और वह खोल जो अलग हुआ उससे नीचे की रचना की देह जाहिर हुई।


और इसी तरह हर मुकाम से गिलाफ या खोल जो कि बनिस्बत ऊपर के ज्यादा मोटा होता गया, खारिज करके नीचे को गिरा दिया गया और निर्मल चेतन अलहदा कर दिया गया और उसी गिलास या खोल के मसाले से नीचे की रचना की देह जाहिर होती गई ।


गरज कि इस मुकाम पर जहां की इंसानी और उससे भी नीचे की रचना है, गिलाफ ज्यादा मोटा था और वह कारण इस मोटाई के महज जड़ हो गया , जैसे कि किसी दरख्त पर बहुत चमडी जो चढी होती है, वह कुछ अरसे बाद खुश्क होकर  गिर जाती और उसमें तरी बिल्कुल नहीं रहती। यही हाल नीचे बढ़ता गया।क्रमशः       


 🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**



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