**परम गुरु हुजूर महाराज
-प्रेम पत्र -भाग 1- कल से आगे-( 10 )
अब समझना चाहिए कि इस सुरत की धार को पहले उसकी बैठक की तरफ उलटना और समेटना और फिर वहां से यानी आंखों के ऊपर अंतर में होकर उसके भंडार की तरफ चढ़ाना, यह काम आत्मा यानी सुरत की कूव्वत का जगाना कहलाता है। रास्ते में कई स्थान यानी मुकाम है। सो जितनी दूर तक यानी जिस स्थान तक जो कोई पहुंचा उसी कदर उसकी सुरत जागी और उतना ही भेद कुदरत और रचना का उसको मालूम हुआ , यानी उस मुकाम से नीचे का सब हाल उसको मालूम पड़ा, पर जो कोई की धुर स्थान तक पहुंचा , जहां से आदि में सुरत का जहूर हुआ और वहां से नीचे नीचे रचना होनी शुरू हुई , उसको कुल भेद कुदरत का मालूम हुआ और उसी को दर्शन परम भंडार यानी कुल मालिक राधास्वामी दयाल का हासिल हुआ। और उसी का नाम परम संत और परम गुरु है और वही परम आनंद को प्राप्त होकर अमर और अजर हो गया और उसी की नरदेह सुफल हुई यानी उसी ने अपनी चेतन शक्ति पूरी पूरी जगाई।
क्रमशः।
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
No comments:
Post a Comment