**परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज
-रोजाना वाकिआत-
21 नवंबर 1932 -सोमवार:-
आज दिन भर पिल कर काम किया। 4:30 बजे जिस्म बिल्कुल चूर हो गया। इसलिए मजबूरन काम छोड़ना पड़ा। जिधर देखो मुश्किलें ही मुश्किलें नजर आती है। मालूम होता है कि दुनिया मुश्किलों की खान है। लेकिन साथ ही मन कहता है कि इंसान मालिक की दया का अधिकारी मुश्किले पार कलने ही के बाद होता है।
जैसे बिना आग में तपाये सोना साफ नहीं होता ऐसे ही बिना मुश्किलों में तपाये है इंसान साफ नहीं होता। मालिक के नियम अटल है और सबके लिए एक से है । इसलिए अंदर अंदर मन खुश भी होता है।।
मिस्टर मॉरिस मार्के ने जो एक अमेरिकन अखबार पत्रकार है कुछ दिन हुए अमेरिका में बजरिए फोर्ड कार 16000 मील का सफर किया और दौरान सफर में सैकड़ों अमरिकनों से मुलाकातें की और गरीब अमीर हर वर्ग के लिए आदमियों से हालात दरियाफ्त करके अमेरिका के लोगों की मौजूदा जिंदगी की निसबत राय कायम की।
आप कहते हैं कि सफर में उन्हे सिर्फ एक सच्चा धार्मिक मिला। बकिया सब मजहब से लापरवाह थे। आपकी राय है कि ईसाईयत का अब अमेरिकन जिंदगी पर बहुत ही कमजोर रह गया है।
अमरीका के बाशिंदे दुनिया भर में सबसे ज्यादा निरूद्देश्य जिंदगी बसर करने वाले हैं। वह ऊंचे ख्यालात जिनकी बुनियाद पर बुजुर्गों ने अमेरिका की प्रजातंत्र कायम की थी अप्राप्त हो गए हैं। हर किसी को अपनी ही पड़ी है। आप सुखी तो जग सुखी इसके मिसदाक (वह जिस पर बात ठीक ठीक घटित होती है) मुल्क के अंदर आजादी, समानता ,स्वराज्य और सुख की तलाश सिर्फ अल्फाज की शक्ल में मौजूद है, जिनका सिर्फ 4 जुलाई के दिन इस्तेमाल होता है।
और यह नहीं है कि इनके बजाय बेहतर ख्यालात ने लोगों के दिलों में जगह कर ली है । नहीं नहीं । यह ख्यालात गायब हो गए हैं और लोगों के दिल कतई कोरे नजर आते हैं । यह है दुनिया के सबसे आसान और सबसे संपन्न मुल्क की अंदरूनी तस्वीर।
और हिंदुस्तानी भाई गरिबी आजादी के आसक्त होकर इसी किस्म की हालत अपने मुल्क के अंदर कायम किया चाहते हैं। क्या सचमुच मुल्क के अंदर कल्कि अवतार के स्वागत के लिए तैयारीयाँ कर रही है.
क्रमशः-.
🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**
...
No comments:
Post a Comment