Sunday, April 5, 2020

एक दिया जलाएं / कवि अनाम



एक दिन दिया जलाने
की घोषणा से हैरान हैं !
कुछ अतिरिक्त बुद्धिमान
लगते बहुत ही परेशान हैं !

पूछते हैं ,  लौजिक क्या है
इससे तो क्या हो जाएगा..?
क्या इन व्यर्थ के कृत्यों से
कोरोना खत्म हो जाएगा ?

क्यो भोर में उठना लगता अच्छा
सुन-सुन चिड़ियों की बोली से,
इसका  लौजिक क्या सिद्ध करें,
क्यों बच्चा सोए लोरी से..?

 जब कोई बोझ उठाते हैं,
मजदूर भला मिल कर सारे,
 "दम लगा कर हईशा "
क्यों बार बार सब हुंकारे,

अब कैसे सिद्घ करें इससे,
कोई हाथ नहीं बढ़ जाता है..!
हुंकार से आता जोश, और
भारी सामान उठ जाता है।

घनघोर उछलती लहरो पर,
मांझी जब नाव चलाते हैं...
"हई रे , हई रे और "ओ  हा हा"
जब गीत निरंतर गाते हैं।

कैसे साबित करें इन गीतों से ,
क्या पतवारें बढ़ जाती हैं ?
जब हाथ हैं अक्सर थक जाते,
हिम्मत से नौका चलती है।

क्या तोप भला थामे है ये,
संगीनें क्या चलवाती है
वंदे मातरम की पुकार फिर
रण में नजर क्यों आती है।

झंडा टुकड़ा है कपड़े का ,
क्यों इसके लिए मर जाते हैं।
दस रुपये का ध्वज प्रतीक,
जब गर्व समझ फहराते हैं।

कमजोरी हो या ताकत हो ,
रहती इंसा के मन में हैं...!
सामूहिकता से सब कष्ट मिटे,
आते जो भी जीवन में हैं।

सूरज की किरणें कभी कभी
कपड़े भी नही सूखा पाती,
जो उनको कहीं एकत्र करो
दुनिया रोशन कर जाती है

तन की ताकत से जो काम न हों,
मन की ताकत से चल जाये,
एक साथ जब दीप प्रकाशित,
रात कहर की ढल जाये।

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