Saturday, April 11, 2020

उपयोगी बातें / कृष्ण मेहता





📿क्रोध पर नियंत्रण हेतु📿*





*🌼यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें। यदि परिवार में पुरुष सदस्यों के कारण आपस में तनाव रहता हो, तो पूर्णिमा के दिन कदंब वृक्ष की सात अखंड पत्तों वाली डाली लाकर घर में रखें। अगली पूर्णिमा को पुरानी डाली कदंब वृक्ष के पास छोड़ आएं और नई डाली लाकर रखें। यह क्रिया इसी तरह करते रहें, तनाव कम होगा।🌼*
[10/04, 08:07] Morni कृष्ण मेहता: *गर्मी के शरबत घर पर बनाए*

*गरमी आते ही ठंडे रसीले शरबत की तलब जाग उठती है। इस मौसम में कई तरह के रस घर में ही तैयार करके हम गरमी के विरुद्ध एक मजबूत दीवार खड़ी कर सकते हैं। आइए कुछ ऐसे ही घर पर शरबत बनाने की विधि बनाने के बारे में जानते हैं।*

*गुलाब (जिन जिन फूलों का शर्बत बनता है उन सभी की विधि एक  ही है) का शरबत :*

*गुलाब का शरबत गरमी में दिल, दिमाग और शरीर को ठंडक पहुँचाता है।*

*लगभग ३० गुलाब लाल गुलाब के फूल, १ चुकंदर, तुलसी की २०-२५ पत्तियाँ, पोदीने के २०-२५ पत्ते, एक बड़ी चम्मच कटा हरा धनिया, ५-६ छोटी इलाइची, ५ कप मिश्री पाउडर ४ नीबू का रस।*

*•गुलाब की पँखुड़ियों को अच्छी तरह धोकर साफ कपड़े पर फैलाइए। दूसरे कपड़े से पोंछकर फालतू पानी हटा दीजिए। एक कप पानी उबालिए।*

*•गुलाब की पँखुड़ियों में उबला पानी डालकर पीस लीजिए। छलनी में छानकर गुलाब के रस को अलग कर लीजिए।*

*•चुकंदर तुलसी, धनिया और पुदीने के पत्ते धोइए और इन सबको मिलाकर बारीक पीस लीजिए। पिसा मिश्रण एक कप पानी मिलाकर ३-४ मिनट तक उबालिए।*

*•मिश्रण के ठंडा होने के बाद, छलनी से छानकर रस अलग कर लीजिए।*

*• ३ कप मिश्री को किसी बरतन में डालिए। १ कप पानी मिलाइए, उबलने के लिए रखिये, मिधरी घुलने के बाद, १-२ मिनट उबालिए और आग बंद कर दीजिए और इस चाशनी को ठंडा होने दीजिए।*

*• बची हुई मिश्री में इलाइची के दाने मिलाइए और पीस लीजिए। चीनी की चाशनी में गुलाब की पँखुड़ियों का रस, चुकंदर के मिश्रण का रस और नीबू का रस मिलाइए, पिसी हुई चीनी भी इसी चाशनी में डाल दीजिए, सारी चीजों को अच्छी तरह मिलाइए।*

*• शरबत को ४-५ घंटे ढककर रखे रहने दीजिए, ताकि सारे स्वाद मिलकर अच्छी तरह महकने लगें। तैयार शरबत को काँच की बोतल में भरकर पानी भरे हुए मिट्टी के घड़े में रख लीजिए. जब भी शरबत बनाना हो, १ गिलास ठंडे पानी में २ बड़ी चम्मच गुलाब शरबत डालिए और मिलाइए।*

*बेल का शरबत :*

*बेल का शरबत न केवल आपको शीतलता देता है बल्कि हाजमा भी दुरुस्त करता है। २ बेल का गूदा, आधा कप मिश्री, ४ कप पानी।*

*बेल के गूदे को एक-दो कप पानी के साथ मथकर घोल लें। बाकी पानी में मिश्री घोल लें। छलनी से बेल के घोल को छानकर मीठा पानी मिला दें। ताजा इस्तेमाल करें।*

*तरबूज का शरबत :*

*६ कप तरबूज का गूदा, १ नीबू का रस, २-३ पुदीना पत्ती, स्वाद के अनुसार काला नमक व मिश्री।*

*तरबूज के गूदे को मिक्सी में पुदीने, मिश्री और नमक के साथ मिक्सी में फेंट लें। १५-२० सेकंड में तरबूज का शरबत तैयार हो जाता है।*

*टेसू के फूल का शरबत :*

*देश के अनेक गाँवों में टेसू के फूलों का मीठा शरबत गरमियों में धूप से बचने के लिए भी पीया जाता है। टेसू के फूलों को रात भर पानी में भिगोकर रखें। सुबह फूलों को निकालकर जो रंगीन पानी बचे, उसमें मिश्री मिलाइए और गरमी में ठंडा रखनेवाला टेसू का शरबत हो गया तैयार। गाँव में लोगों का मानना है कि ये मीठा शरबत बहुत ठंडा करता है और गरमी की कड़ी धूप से बचाता है। आप भी इसे अपने घर पर बनाएँ और इस गरमी में धूप से सुरक्षित रहें और मन को रखें ठंडा।*

*ठंडाई :*

*ठंडाई का सेवन करने के बाद यदि तपती दुपहरी में भी बाहर जाना पड़े तो शरीर पर गरमी का असर नहीं होता।*

*इसमें १-१ चम्मच सौंफ, धनिया, इलाइची, काली मिर्च, खसखस, कासनी, गुलाब के फूल, कमलगट्टा, तरबूज, ककड़ी व खरबूजे के बीज के अलावा बादाम, पिस्ता रात में भिगोकर रख दें।*

*सुबह सिलबट्टे पर या मिक्सी में पीस लें। स्वादानुसार मिश्री डालकर प्रयोग करें।*

*इमली व केरी का पानी :*

*गरमी के मौसम में लू, तापघात व हैजे से बचाव के लिए इमली व केरी के पानी का उपयोग किया जाता है। इमली का पानी बनाना आसान है। रात के समय इमली को टुकड़े करके पानी में भिगोकर रखने के बाद सुबह इसे महीन कपड़े से छानकर मिश्री मिलाकर इसका सेवन करने से लू नहीं लगती। वहीं केरी का पानी बनाने के लिए कच्ची केरी के टुकड़ों को पानी में उबालकर सेंधा नमक व काली मिर्च का पाउडर मिला सेवन करने से हैजा व डायरिया की शिकायत नहीं रहती।*

*किसी भी सूखे फल या चूर्ण का शर्बत बनाने हेतु उसके बारीक या दरदरे पाउडर को 8 से 10 घण्टे के लिए मिट्टी या काँच के पात्र में भिगो कर रखें*

*विशेष : अपवित्र पदार्थों से बने हुए, केमिकलयुक्त, केवल कुछ क्षणों तक शीतलता का आभास कराने वाले परंतु आंतरिक गर्मी बढ़ाने वाले बाजारू शीतपेय आकर्षक रंगीन जहर हैं। अतः इनसे सावधान !*

*निरोगी रहने हेतु महामन्त्र*

*मन्त्र 1 :-*

*• भोजन व पानी के सेवन प्राकृतिक नियमानुसार करें*

*• ‎रिफाइन्ड नमक,रिफाइन्ड तेल,रिफाइन्ड शक्कर (चीनी) व रिफाइन्ड आटा ( मैदा ) का सेवन न करें*

*• ‎विकारों को पनपने न दें (काम,क्रोध, लोभ,मोह,इर्ष्या,)*

*• ‎वेगो को न रोकें ( मल,मुत्र,प्यास,जंभाई, हंसी,अश्रु,वीर्य,अपानवायु, भूख,छींक,डकार,वमन,नींद,)*

*• ‎एल्मुनियम बर्तन का उपयोग न करें ( मिट्टी के सर्वोत्तम)*

*• ‎मोटे अनाज व छिलके वाली दालों का अत्यद्धिक सेवन करें*

*• ‎भगवान में श्रद्धा व विश्वास रखें*

*मन्त्र 2 :-*

*• पथ्य भोजन ही करें ( जंक फूड न खाएं)*

*• ‎भोजन को पचने दें ( भोजन करते समय पानी न पीयें एक या दो घुट भोजन के बाद जरूर पिये व डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पिये)*

*• ‎सुबह उठेते ही 2 से 3 गिलास गुनगुने पानी का सेवन कर शौच क्रिया को जाये*

*• ‎ठंडा पानी बर्फ के पानी का सेवन न करें*

*• ‎पानी हमेशा बैठ कर घुट घुट कर पिये*

*• ‎बार बार भोजन न करें आर्थत एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें*

*भाई राजीव दीक्षित जी के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत और स्वदेशी भारत स्वावलंबी भारत स्वाभिमानी भारत के निर्माण में एक पहल आप सब भी अपने जीवन मे भाई राजीव दीक्षित जी को अवश्य सुनें*

*स्वदेशीमय भारत ही हमारा अंतिम लक्ष्य है :- भाई राजीव दीक्षित जी*

*मैं भारत को भारतीयता के मान्यता के आधार पर फिर से खड़ा करना चाहता हूँ उस काम मे लगा हुआ हूँ*

*आपका शुभचिंतक*
*डॉक्टर वेद प्रकाश (होमेओपेथी चिकित्सा हेतु रात्रि 9 बजे के बाद 8709871868 पर सम्पर्क करें*
*गोविन्द शरण प्रसाद 9958148111*
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*5 Sept 2016 से अमर शहीद भाई राजीवदीक्षित जी को अपना गुरुद्रोणाचार्य मानकर एक्लव्य बनने के प्रयास में*

*उनके बताए आयुर्वेद के पानी के सूत्रों का कट्टर अनुयायी व क्षमता व परिस्थिति अनुसार आयुर्वेद के यम नियम का पालनकर्ता।*

*उनके व हमसब के सपने स्वस्थ भारत समृद्ध भारत निर्माण हेतु (मोक्ष प्राप्ति हेतु अपने व औरो के त्रैहिक (दैहिक दैविक व भौतिक)दुःखो  को दूर करने का प्रयासरत्त आदरणीय होम्योपैथी डॉक्टर वेद प्रकाश जी 8709871868 जी के मार्गदर्शन के सहयोग से*

*आयुर्वेद, घरेलू,पंचगव्य व होमेओपेथी के अध्ययन  व भाई राजीवदीक्षित के विचार ज्ञान  से ज्ञानित हो ज्ञान को निस्वार्थ भाव से ज्ञान का प्रचार प्रसार*

*वन्देमातरम*


 कृष्ण मेहता: *काली हल्दी के प्रयोग*
📿संपूर्ण समाधान 📿

*काली हल्दी को चमत्कारी माना जाता है इसमें तांत्रिक और मांत्रिक ताकत छिपी होती है। इसके उपयोग से बीमार व्यक्ति को स्वस्थ किया जा सकता है इसके अलावा यह तांत्रिक विधि से सिद्ध करने पर व्यक्ति को धनवान बनाती है। हम बता रहे हैं इसकी ऐसी ही ताकत के बारे में।*

1- यदि परिवार में कोई व्यक्ति निरन्तर अस्वस्थ रहता है, तो प्रथम गुरूवार को आटे के दो पेड़े बनाकर उसमें गीली चने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी सी पिसी काली हल्दी को दबाकर रोगी व्यक्ति के उपर से 7 बार उतार कर गाय को खिला दें। यह उपाय लगातार 3 गुरूवार करने से आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा।
2. किसी शुभ दिन गुरु पुष्य या रवि पुष्य नक्षत्र हो, राहुकाल न हो, शुभ घड़ी में इस हल्दी को लाएँ। इसे शुद्ध जल से भीगे कपड़े से पोंछकर लोबान की धूप की धूनी में शुद्ध कर लें व कपड़े में लपेटकर रख दें। आवश्यकता होने पर इसका एक माशा चूर्ण ताजे पानी के साथ सेवन कराएँ व एक छोटा टुकड़ा काटकर धागे में पिरोकर रोगी के गले या भुजा में बाँध दें। इस प्रकार उन्माद, मिर्गी, भ्रांति और अनिन्द्रा जैसे मानसिक रोगों में बहुत लाभ होता है।
3- काली हल्दी के 7 या 9 या 11 दाने बनाएँ। उन्हें धागे में पिरोकर धूप आदि देकर जिस व्यक्ति के गले में यह माला पहनाई जाए उसे ग्रहपीड़ा, बाहरी हवा, टोना-टोटका, नजर आदि से बचाया जा सकता है।
4- यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को नजर लग गयी है, तो काले कपड़े में हल्दी को बांधकर 7 बार उपर से उतार कर बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें।
5- गुरु पुष्य नक्षत्र में काली हल्दी को सिंदूर में रखकर लाल वस्त्र में लपेटकर धूप आदि देकर कुछ सिक्कों के साथ बाँधकर बक्से या तिजोरी में रख दें तो धनवृद्धि होने लगती है।
6-किसी की जन्मपत्रिका में गुरू और शनि पीडि़त है, जिससे धन न रुकता हो या कम धंधा बार बार ठप हो जाता हो तो वह  शुक्लपक्ष के प्रथम गुरूवार से नियमित रूप से काली हल्दी पीसकर तिलक लगाएं,ये दोनों ग्रह शुभ फल देने लगेंगे।
7- यदि किसी के पास धन आता तो बहुत है किन्तु टिकता नहीं है, उन्हें यह उपाय अवश्य करना चाहिए। शुक्लपक्ष के प्रथम शुक्रवार को चांदी की डिब्बी में काली हल्दी, नागकेशर व सिन्दूर को साथ में रखकर मां लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श करवा कर धन रखने के स्थान पर रख दें। यह उपाय करने से धन रुकने लगेगा।
8. यदि आपके व्यवसाय में निरन्तर गिरावट आ रही है, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार को पीले कपड़े में काली हल्दी, 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र, चांदी का सिक्का व 11 अभिमंत्रित धनदायक कौडिय़ों को बांधकर 108 बार
ऊँ नमो भगवते वासुदेव नम: का जाप कर धन रखने के स्थान पर रखने से व्यवसाय में प्रगतिशीलता आ जाती है।
9- यदि आपका व्यवसाय मशीनों से सम्बन्धित है, और आये दिन कोई   मशीन  खराब हो जाती है, तो  काली हल्दी को पीसकर केशर व गंगा जल मिलाकर प्रथम बुधवार को उस मशीन पर स्वास्तिक बना दें। यह उपाय करने से मशीन जल्द  खराब नहीं होगी।
10- दीपावली के दिन पीले वस्त्रों में काली हल्दी के साथ एक चांदी का सिक्का  रखकर धन रखने के स्थान पर रख देने से वर्ष भर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
*अन्य उपाय*
1.चंदन की भाँति काली हल्दी का टीका लगाएँ। यदि अपनी कनिष्ठा उँगली का रक्त भी मिला दिया जाए तो प्रभाव में वृद्धि होगी। यह तिलक लगाने वाला सबका प्यारा होता है। सामने वाले को आकर्षित करता है।
2. काली हल्दी रोली तुलसी की मंजरी को समरूप आंवले के रस में पीस कर जिसके भी सामने जायेंगे वो स्वत: आपके अनुरूप कार्य करेगा।
3. व्यक्ति विशेष हेतु वशीकरण के लिए काली हल्दी, श्वेतार्क की जड़, श्वेत चन्दन, गोरोचन, पान और हरसिंगार की जड़ पीस कर एक चाँदी की डिब्बी में लेप बनाकर रख लें। जिसे वश में करना हो उसके सम्मुख आने से पूर्व इसका तिलक धारण कर लें । काली हल्दी , श्वेतार्क मूल रक्त चन्दन और हनुमान मंदिर या काली मंदिर में हुए हवन की विभूति गोमूत्र में मिलाकर लेप बनायें और उससे घर के मुख्य  द्वार और सभी प्रवेश के दरवाजों के ऊपर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें। इससे किसी भी प्रकार की बुरी नजऱ, टोना टोटका या बाधा आपके घर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे।  काली हल्दी का चूर्ण दूध में भिगोकर चेहरे और शरीर पर लेप करने से सौन्दर्य की वृद्धि होती है।

काली हल्दी का तंत्र शास्त्र में बड़ा महत्व है। इसमें अद्भुत शक्ति है इसका सम्यक उपयोग अपने और दूसरों के कल्याण के लिए किया जा सकता है। इसे आसानी से जागृत किया जा सकता है।


  कृष्ण मेहता: 🙏

श्री_पंचमुखी_हनुमानजी 🙏
   
 🌷भगवान_शंकर_के_पांच_अवतारों_की_शक्ति🌷*

शंकरजी के पांचमुख—तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव, अघोर व ईशान हैं; उन्हीं शंकरजी के अंशावतार हनुमानजी भी पंचमुखी हैं । मार्गशीर्ष (अगहन) मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को, पुष्य नक्षत्र में, सिंहलग्न तथा मंगल के दिन पंचमुखी हनुमानजी ने अवतार धारण किया । हनुमानजी का यह स्वरूप सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाला है । हनुमानजी का एकमुखी, पंचमुखी और ग्यारहमुखी स्वरूप ही अधिक प्रचलित हैं ।

हनुमानजी के पांचों मुखों के बारे में श्रीविद्यार्णव-तन्त्र में इस प्रकार कहा गया है—

पंचवक्त्रं महाभीमं त्रिपंचनयनैर्युतम् ।
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकाम्यार्थ सिद्धिदम् ।।

विराट्स्वरूप वाले हनुमानजी के पांचमुख, पन्द्रह नेत्र हैं और दस भुजाएं हैं जिनमें दस आयुध हैं—‘खड्ग, त्रिशूल, खटवांग, पाश, अंकुश, पर्वत, स्तम्भ, मुष्टि, गदा और वृक्ष की डाली ।

▪️ पंचमुखी हनुमानजी का पूर्व की ओर का मुख वानर का है जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्य के समान है । वह विकराल दाढ़ों वाला है और उसकी भृकुटियां (भौंहे) चढ़ी हुई हैं ।

▪️ दक्षिण की ओर वाला मुख नृसिंह भगवान का है । यह अत्यन्त उग्र तेज वाला भयानक है किन्तु शरण में आए हुए के भय को दूर करने वाला है ।

▪️ पश्चिम दिशा वाला मुख गरुड़ का है । इसकी चोंच टेढ़ी है । यह सभी नागों के विष और भूत-प्रेत को भगाने वाला है । इससे समस्त रोगों का नाश होता है ।

▪️ इनका उत्तर की ओर वाला मुख वाराह (सूकर) का है जिसका आकाश के समान कृष्णवर्ण है । इस मुख के दर्शन से पाताल में रहने वाले जीवों, सिंह व वेताल के भय का और ज्वर का नाश होता है।

▪️ पंचमुखी हनुमानजी का ऊपर की ओर उठा हुआ मुख हयग्रीव (घोड़े) का है । यह बहुत भयानक है और असुरों का संहार करने वाला है । इसी मुख के द्वारा हनुमानजी ने तारक नामक महादैत्य का वध किया था ।
।।पंचमुखी हनुमानजी में है भगवान के पांच अवतारों की शक्ति।।

पंचमुखी हनुमानजी में भगवान के पांच अवतारों की शक्ति समायी हुयी है इसलिए वे किसी भी महान कार्य को करने में समर्थ हैं । पंचमुखी हनुमानजी की पूजा-अर्चना से वराह, नृसिंह, हयग्रीव, गरुड़ और शंकरजी की उपासना का फल प्राप्त हो जाता है । जैसे गरुड़जी वैकुण्ठ में भगवान विष्णु की सेवा में लगे रहते हैं वैसे ही हनुमानजी श्रीराम की सेवा में लगे रहते हैं । जैसे गरुड़ की पीठ पर भगवान विष्णु बैठते हैं वैसे ही हनुमानजी की पीठ पर श्रीराम-लक्ष्मण बैठते हैं। गरुड़जी अपनी मां के लिए स्वर्ग से अमृत लाये थे, वैसे ही हनुमानजी लक्ष्मणजी के लिए संजीवनी-बूटी लेकर आए ।

 *।।हनुमानजी के पंचमुख की आराधना से मिलते हैं पांच वरदान।‌।*

हनुमानजी के पंचमुखी विग्रह की आराधना से पांच वरदान प्राप्त होते हैं । नरसिंहमुख की सहायता से शत्रु पर विजय, गरुड़मुख की आराधना से सभी दोषों पर विजय, वराहमुख की सहायता से समस्त प्रकार की समृद्धि तथा हयग्रीवमुख की सहायता से ज्ञान की प्राप्ति होती है। हनुमानमुख से साधक को साहस एवं आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है ।

हनुमानजी के पांचों मुखों में तीन-तीन सुन्दर नेत्र आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक तापों (काम, क्रोध और लोभ) से छुड़ाने वाले हैं ।

पंचमुखी हनुमानजी सभी सिद्धियों को देने वाले, सभी अमंगलों को हरने वाले तथा सभी प्रकार का मंगल करने वाले—मंगल भवन अमंगलहारी हैं ।

 *।‌। हनुमानजी ने क्यों धारण किए पंचमुख ।।*

श्रीराम और रावण के युद्ध में जब मेघनाद की मृत्यु हो गयी तब रावण धैर्य न रख सका और अपनी विजय के उपाय सोचने लगा । तब उसे अपने सहयोगी और पाताल के राक्षसराज अहिरावण की याद आई जो मां भवानी का परम भक्त होने के साथ साथ तंत्र-मंत्र का ज्ञाता था। रावण सीधे देवी मन्दिर में जाकर पूजा में तल्लीन हो गया । उसकी आराधना से आकृष्ट होकर अहिरावण वहां पहुंचा तो रावण ने उससे कहा—‘तुम किसी तरह राम और लक्ष्मण को अपनी पुरी में ले आओ और वहां उनका वध कर डालो; फिर ये वानर-भालू तो अपने-आप ही भाग जाएंगे ।’

रात्रि के समय जब श्रीराम की सेना शयन कर रही थी तब हनुमानजी ने अपनी पूंछ बढ़ाकर चारों ओर से सबको घेरे में ले लिया । अहिरावण विभीषण का वेष बनाकर अंदर प्रवेश कर गए। अहिरावण ने सोते हुए अनन्त सौन्दर्य के सागर श्रीराम-लक्ष्मण को देखा तो देखता ही रह गया । उसने अपने माया के दम पर भगवान राम की सारी सेना को निद्रा में डाल दिया तथा राम एव लक्ष्मण का अपहरण कर उन्हें पाताललोक ले गया।

आकाश में तीव्र प्रकाश से सारी वानर सेना जाग गयी । विभीषण ने यह पहचान लिया कि यह कार्य अहिरावण का है और उसने हनुमानजी को श्रीराम और लक्ष्मण की सहायता करने के लिए पाताललोक जाने को कहा।

हनुमानजी पाताललोक की पूरी जानकारी प्राप्त कर पाताललोक पहुंचे । पाताललोक के द्वार पर उन्हें उनका पुत्र मकरध्वज मिला । हनुमानजी ने आश्चर्यचकित होकर कहा
—‘हनुमान तो बाल ब्रह्मचारी हैं । तुम उनके पुत्र कैसे ?’

मकरध्वज ने कहा कि जब लंकादहन के बाद आप समुद्र में पूंछ बुझाकर स्नान कर रहे थे तब श्रम के कारण आपके शरीर से स्वेद (पसीना) झर रहा था जिसे एक मछली ने पी लिया । वह मछली पकड़कर जब अहिरावण की रसोई में लाई गयी और उसे काटा गया तो मेरा जन्म हुआ । अहिरावण ने ही मेरा पालन-पोषण किया इसलिए मैं उसके नगर की रक्षा करता हूँ । हनुमानजी का मकरध्वज से बाहुयुद्ध हुआ और वे उसे बांधकर देवी मन्दिर पहुंचे जहां श्रीराम और लक्ष्मण की बलि दी जानी थी । हनुमानजी को देखते ही देवी अदृश्य हो गयीं और उनकी जगह स्वयं रामदूत देवी के रूप में खड़े हो गए।

उसी समय श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—‘आपत्ति के समय सभी प्राणी मेरा स्मरण करते हैं, किन्तु मेरी आपदाओं को दूर करने वाले तो केवल पवनकुमार ही हैं। अत: हम उन्हीं का स्मरण करें ।’

लक्ष्मणजी ने कहा—‘यहां हनुमान कहां ?’ श्रीराम ने कहा—‘पवनपुत्र कहां नहीं हैं ? वे तो पृथ्वी के कण-कण में विद्यमान है । मुझे तो देवी के रूप में भी उन्हीं के दर्शन हो रहे हैं ।’


 *।।श्रीराम के प्राणों की रक्षा के लिए हनुमानजी ने धारण किए पंचमुख।।*

हनुमानजी ने वहां पांच दीपक पांच जगह पर पांच दिशाओं में रखे देखे जिसे अहिरावण ने मां भवानी की पूजा के लिए जलाया था । ऐसी मान्यता थी कि इन पांचों दीपकों को एक साथ बुझाने पर अहिरावण का वध हो जाएगा । हनुमानजी ने इसी कारण पंचमुखी रूप धरकर वे पांचों दीप बुझा दिए  और अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण को कंधों पर बैठाकर लंका की ओर उड़ चले ।

‘श्रीहनुमत्-महाकाव्य’ के अनुसार एक बार पांच मुख वाला राक्षस भयंकर उत्पात करने लगा। उसे ब्रह्माजी से वरदान मिला था कि उसके जैसे रूप वाला व्यक्ति ही उसे मार सकता है । देवताओं की प्रार्थना पर भगवान ने हनुमानजी को उस राक्षस को मारने की आज्ञा दी । तब हनुमानजी ने वानर, नरसिंह, वाराह, हयग्रीव और गरुड़—इन पंचमुख को धारण कर राक्षस का अंत कर दिया ।

 *।।पंचमुखी हनुमानजी का ध्यान।।*

पंचास्यमच्युतमनेक विचित्रवीर्यं
वक्त्रं सुशंखविधृतं कपिराज वर्यम् ।
पीताम्बरादि मुकुटैरभि शोभितांगं
पिंगाक्षमाद्यमनिशंमनसा स्मरामि।। (श्रीविद्यार्णव-तन्त्र)

पंचमुखी हनुमान पीताम्बर और मुकुट से अलंकृत हैं । इनके नेत्र पीले रंग के हैं । इसलिए इन्हें ‘पिंगाक्ष’ कहा जाता है । हनुमानजी के नेत्र अत्यन्त करुणापूर्ण और संकट और चिन्ताओं को दूर कर भक्तों को सुख देने वाले हैं । हनुमानजी के नेत्रों की यही विशेषता है कि वे अपने स्वामी श्रीराम के चरणों के दर्शन के लिए सदैव लालायित रहते हैं।

मन्त्र,उनका द्वादशाक्षर मन्त्र है— *‘ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्।’*

किसी भी पवित्र स्थान पर हनुमानजी के द्वादशाक्षर मन्त्र का एक लाख जप एवं आराधना करने से साधक को सफलता अवश्य मिलती है। ऐसा माना जाता है कि पुरश्चरण पूरा होने पर हनुमानजी अनुष्ठान करने वाले के सामने आधी रात को स्वयं दर्शन देते हैं।

महाकाय महाबल महाबाहु महानख,महानद महामुख महा मजबूत है।

भनै कवि ‘मान’ महाबीर हनुमान महा-देवन को देव महाराज रामदूत है।।   ,🙏🙏🙏
[10/04, 08:09] Morni कृष्ण मेहता: "शब्दों" की उर्जा मन को प्रभावित कर तन को गति देती है। शब्द ही हैं जो गाली का संचार करके वैमनस्य पैदा कर देते हैं और शब्द ही हैं जिनसे मन-मानस में शान्ति/शक्ति का प्रवहन होता है। सांसारिक सभी कार्य शब्दों से संचालित होते हैं। ऐसा नहीं कि हमारे शब्द केवल दूसरों को ही प्रभावित करते हैं, हम स्वयं, दूसरों के मुकाबले, उनसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। दूसरों को तो हम कभी/कहीं परिस्थितिवश कहते हैं, लेकिन *किसी को कुछ कहने से, बहुत पहले और बाद में भी, बार-बार हम उन शब्दों को मंत्रवत (मन ही मन) जुगाली करते रहते हैं। बुरे शब्दों का प्रयोग करने से हममें आसुरी शक्तियां जाग्रत होकर मानसिक उर्जा का नाश करती हैं और अच्छे शब्दों के प्रयोग से हममें ही दैविक (दिव्य) शक्तियां जाग्रत होती हैं। जिस प्रकार तीली दूसरे को जलाने से पूर्व स्वयं जलती है, इसी प्रकार हम भी अपना बुरा या भला करते हैं। साथ ही हमारा बोलना/सोचना/विचारना, यंत्रवत/नाटकीय न होकर वास्तविक और होशपूर्ण हो, क्योंकि ये हमारे तन-मन-जीवन को बनाने/बिगाड़ने में सहयोगी होते हैं।* सुप्रभात -आज का दिन शुभ व मंगलमय हो।
**************
हम सब करने/न करने के बोझ से भरे हैं कि हम दूसरों के लिए क्या/कैसे/कितना कर रहे हैं और दूसरे हमें समझते/मानते/महत्व नहीं देते। यह पीड़ा, हमारे करने और उसकी सुखद सन्तुष्टि से हमें वंचित कर देती है। साथ ही हमारी क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। कभी वृद्धों/बड़े-बूढ़ों की बातों को ध्यान से सुनें, तो निष्कर्ष यही मिलेगा कि "हमने बहुत किया, पर लोग हमें मानते नहीं"। *हमारा ध्यान कृत्य करने और उसके आनन्द की ओर न होकर, दूसरों की आंख में अपनी अहमियत को ढूंढने में है, तो हम अपने को केवल दुखी/निराश/व्यथित/हारे हुए ही पायेंगे। हम कुछ भी/कैसा भी/किसी के लिए भी करते हों, निखारते/बनाते अपने ही जीवन/ऊर्जा/भविष्य को हैं। दूसरे हमारी ऊर्जा को कृत्य में बदलने (convert) करने का माध्यम भर हैं। इसका सरल शब्दों में अर्थ है कि हमने आज तक किसी के लिए कुछ नहीं किया। अपनी ऊर्जा से (किसी के नाम पर) अच्छा किया तो अपने को अच्छे की तरफ प्रवाहित किया और बुरा किया तो अपनी ऊर्जा को बुरी दिशा की ओर अग्रसर किया। दूसरे से अपने ध्यान को हटाने मात्र से, हम अपनी जीवन-शैली के प्रति जागरूक हो जाते हैं। फिर हम चाहकर भी "बुरा" कर नहीं सकते। हमारी दृष्टि यदि दूसरे पर है, तो हमारे जीवन का, सदा निराशा/हताशा में ही डूबते-उतराते रहना निश्चित है।* सुप्रभात -आज का दिन शुभ व मंगलमय हो।


राधास्वामी
राधास्वामी
राधास्वामी
राधास्वामी
राधास्वामी







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