Sunday, April 5, 2020

गजल / दिनेश श्रीवास्तव




दोहा छंद आधारित हिंदी ग़ज़ल
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               "फिर से होगी भोर"
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दीप दीप जलता रहे,अँधियारा घनघोर।
आह्वाहन है देश का,फिर से होगी भोर।।

 नव ऊर्जा नव जोश से,मन में भर उत्साह।
करें अंत इस क्लेश का,फिर से होगी भोर।।

 रोशन होगा देश अब, होगा शीघ्र विनाश।
आया रोग विदेश का,फिर से होगी भोर।।

 विपदा के इस काल में, धीरज का संदेश।
पालन हो संदेश का, फिर से होगी भोर।।

नेह डोर को थामकर, जले दीप निर्वाध।
 क्षीण न हो आवेश का, फिर से होगी भोर।।

 विस्तृत धवल प्रकाश से, मिट जाए चहुँ ओर।
 अँधियारा परिवेश का, फिर से होगी भोर।।

 छिन्न भिन्न होगा यहाँ, हो जायेगा अंत।
 राज्य यहाँ तिमिरेश का,फिर से होगी भोर।।

तमसो मा ज्योतिर्गमय, महामंत्र उपचार।
ऐसे रोग विशेष का,फिर से होगी भोर।।

कण कण आलोकित यहाँ, फैले जगत प्रकाश
कहना यही 'दिनेश' का, फिर से होगी भोर।।

                           दिनेश श्रीवास्तव

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