1-2 कथाएं
प्रस्तुति कृष्ण मेहता:
*अपने परमात्मा,अपने गुरुजी का शुकराना करने से हमारे जीवन में क्या बदलाव आता है*
*शुकराना - (उत्कृष्ट कहानी)
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एक पक्षी था जो रेगिस्तान में रहता था, बहुत बीमार, कोई पंख नहीं, खाने-पीने के लिए कुछ नहीं, रहने के लिए कोई आश्रय नहीं था। एक दिन एक कबूतर गुजर रहा था, इसलिए बीमार दुखी पक्षी ने कबूतर को रोका और पूछा "तुम कहाँ हो जा रहा है? " इसने उत्तर दिया "मैं स्वर्ग जा रहा हूँ"।
तो बीमार पक्षी ने कहा "कृपया मेरे लिए पता करें, कब मेरी पीड़ा समाप्त हो जाएगी?" कबूतर ने कहा, "निश्चित, मैं करूँगा।" और बीमार पक्षी को एक अच्छा अलविदा बोली। कबूतर स्वर्ग पहुंचा और प्रवेश द्वार पर परी प्रभारी के साथ बीमार पक्षी का संदेश साझा किया।
परी ने कहा, "पक्षी को जीवन के अगले सात वर्षों तक इसी तरह से ही भुगतना पड़ेगा, तब तक कोई खुशी नहीं।"
कबूतर ने कहा, "जब बीमार पक्षी यह सुनता है तो वह निराश हो जाएगा। क्या आप इसके लिए कोई उपाय बता सकते हैं।"
देवदूत ने उत्तर दिया, "उसे इस वाक्य को हमेशा बोलने के लिए कहो *" सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "* बीमार पक्षी से फिर से मिलने के लिए कबूतर ने स्वर्गदूत का संदेश दिया।
सात दिनों के बाद कबूतर फिर से गुजर रहा था और उसने देखा कि पक्षी बहुत खुश था, उसके शरीर पर पंख उग आए, एक छोटा सा पौधा रेगिस्तानी इलाके में बड़ा हुआ, पानी का एक छोटा तालाब भी था, चिड़िया खुश होकर नाच रही थी। कबूतर चकित था। देवदूत ने कहा था कि अगले सात वर्षों तक पक्षी के लिए कोई खुशी नहीं होगी। इस सवाल को ध्यान में रखते हुए कबूतर स्वर्ग के द्वार पर देवदूत से मिलने गया।
कबूतर ने परी को अपनी क्वेरी दी। देवदूत ने उत्तर दिया, "हाँ, यह सच है कि पक्षी के लिए सात साल तक कोई खुशी नहीं थी लेकिन क्योंकि पक्षी हर स्थिति में *" सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "* बोल रहा था और भगवान का शुक्र कर रहा था, इस कारण उसका जीवन बदल गया।
जब पक्षी गर्म रेत पर गिर गया तो उसने कहा *"सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "*
जब यह उड़ नहीं सकता था तो उसने कहा, *"सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "*
जब उसे प्यास लगी और आसपास पानी नहीं था, तो उसने कहा, *" सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "*
जो भी स्थिति है, पक्षी दोहराता रहा, *" सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "* और इसलिए सात साल सात दिनों में समाप्त हो गए।
जब मैंने यह कहानी सुनी, तो मैंने अपने जीवन को महसूस करने, सोचने, स्वीकार करने और देखने के तरीके में एक जबरदस्त बदलाव महसूस किया
मैंने अपने जीवन में इस कविता को अपनाया। जब भी मैंने जो स्थिति का सामना किया, मैंने इस कविता को पढ़ना शुरू कर दिया " *सब कुछ के लिए भगवान तेरा शुक्र है। "* इसने मुझे मेरे विचार को मेरे जीवन में शिफ्ट करने में मदद की, जो मेरे पास नहीं है।
*उदाहरण के लिए;*
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अगर मेरा सिर दर्द करता है तो मुझे लगता है कि मेरा बाकी शरीर पूरी तरह से ठीक और स्वस्थ है और मुझे लगता है कि सिरदर्द मुझे बिल्कुल परेशान नहीं करता है।
उसी तरह मैंने अपने रिश्तों (चाहे परिवार, दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी) के वित्त, सामाजिक जीवन, व्यवसाय और हर उस चीज का उपयोग करना शुरू कर दिया, जिसके साथ मैं संबंधित हो सकता हूं। मैंने इस कहानी को सभी के साथ साझा किया जिसके साथ मैं संपर्क में आया और इसने उनके व्यवहार में भी एक बड़ी बदलाव लाया।
इस सरल कविता का मेरे जीवन पर वास्तव में गहरा प्रभाव पड़ा, मुझे लगने लगा कि मैं कितना धन्य हूँ, मैं कितना खुश हूँ, जीवन कितना अच्छा है।
इस संदेश को साझा करने का उद्देश्य हम सभी को इस बारे में अवगत कराना है कि “
*ATTITUDE OF GRATITUDE (शुक्राना और आभार का फल)* कितना शक्तिशाली है। यह हमारे जीवन को नया रूप दे सकता है ... !!!
हमारे जीवन में बदलाव का अनुभव करने के लिए इस कविता को लगातार सुनें।
इसलिए आभारी रहें, और अपने दृष्टिकोण में बदलाव देखें।
_*विनम्र बनो, और तुम कभी ठोकर नहीं खाओगे।*_
*हमेशा हर चीज और हर पल अपने मालिक,अपने गुरुजी का शुक्रगुजार रहो !*
2
*"सन्त का प्रशाद"*
👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻
*राजा पीपा, एक धनी राजपूत था। एक बार उसके दिल में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई। उसने वजीरों को इकट्ठा करके पूछा कि ‘क्या कोई ऐसा महात्मा है जिससे मैं ज्ञान दान ले सकूँ’ ?*
*वजीरों ने कहा:-"महाराज ! इस वक़्त तो जूते गाँठने वाले संत गुरु रविदास जी है, जो आपके महल के पास थोड़ी दूरी पर ही रहते है।"*
*अब राजा मन में सोचने लगा कि क्या करूँ ? परमार्थ भी जरूरी है। अगर खुल्लम-खुल्ला जाता हूँ तो लोग तरह-तरह की बातें करेंगे कि राजपूत राजा होकर एक निम्न जाति के व्यक्ति के घर में जाता है।*
*फिर राजा ने सोचा कि यदि संत गुरु रविदास उन्हें अकेले मिले तो मैं उनसे नाम ले लूँ।*
*एक दिन ऐसा मौका आया कि कोई त्यौहार था और सारी प्रजा गंगा स्नान के लिए गई हुई थी। इधर राजा अकेला था और संत गुरु रविदास जी का मौहल्ला भी सूना था। कोई अपने घर पर नहीं था। राजा छुपते छुपाते संत गुरु रविदास जी के घर गया और प्रार्थना की:-"गुरु महाराज ! मुझे नाम दे दो।”*
*संत गुरु रविदास जी ने चमड़ा भिगोने वाले कुंड में से पानी का एक चुल्लू भर कर राजा की तरफ बढ़ाया और कहा:-” राजा ! ले यह पी ले।”*
*राजा ने हाथ आगे करके वह पानी ले तो लिया लेकिन चमड़े वाला पानी एक क्षत्रिय राजा कैसे पीता ? उन्होंने इधर उधर देखा और पानी बाहों के बीच में गिरा लिया। संत रविदास जी ने यह सब देख लिया परंतु जबान से कुछ नहीं कहा। राजा चुपचाप सिर झुका कर वहाँ से आ गए।*
*महल में जाकर उन्होंने धोबी को बुलाया और हुक्म दिया कि इसी वक्त इस कुर्ते को गंगा घाट पर धो कर लाओ। धोबी, कुर्ते को घर ले गया।उसने दाग उतारने की बहुत कोशिश की पर सब कोशिशें बेकार गई।*
*फिर उस धोबी ने अपनी लड़की से कहा:- इस कुर्ते पर जो दाग है उनको मुँह में लेकर चूस लो जिससे यह दाग निकल जाए और कुर्ता जल्दी साफ हो जाए, नहीं तो राजा नाराज हो जाएंगे।*
*लड़की मासूम थी। वह दाग चूसकर थूकने की बजाए, अंदर निगल गई। इसका परिणाम यह हुआ कि वह लड़की ज्ञान ध्यान की बातें करने लगी।*
*धीरे-धीरे यह खबर शहर में फैल गई की धोबी की लड़की महात्मा है।आखिर राजा तक भी यह बात पहुँच गई। जब राजा को यह पता चला तो वह एक दिन धोबी के घर पहुँचे।
*लड़की राजा को देखकर हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। राजा ने कहा:"देख बेटी ! मैं तेरे पास भिखारी बनकर आया हूँ। राजा बनकर नहीं आया हूँ।”*
*लड़की ने कहा "मैं आपको राजा समझकर नहीं उठी,बल्कि मुझे जो कुछ मिला है वह आपकी बदौलत ही मिला है।"राजा ने हैरान होकर पूछा कि मेरी बदौलत ?*
*लड़की ने कहा:-जी हाँ !”राजा ने कहा:-"वह कैसे ?"तो लड़की बोली:- 'मुझे जो कुछ मिला है आपके कुर्ते से मिला है।जो भी भेद था आपके कुर्ते में था।"*
*यह बात सुनकर राजा अपने आप को कोसने लगा और कहने लगा कि धिक्कार है मेरे राजपाट को, धिक्कार है मेरे क्षत्रिय होने को।*
*जब राजा को ठोकर लगी तो वह लोक लाज और ऊंच-नीच की परवाह न करता हुआ सीधा संत रविदास जी के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर उनके पैरों में गिर गया:- 'गुरुदेव ! वह चरणामृत मुझे फिर से दे दो।" संत रविदास जी ने कहा:- "अब नहीं। जब तू पहली बार आया था तो मैंने सोचा कि तू क्षत्रिय राजा होकर मेरे घर आया है। तो तुझे मैं वह चीज दूँ जो कभी नष्ट न हो। वह कुंड का पानी नहीं था बल्कि वह अमृत था, ज्ञान का भंडार था। लेकिन तूने चमड़े का पानी समझकर उससे घृणा की और अपने कुर्ते पर गिरा लिया।'*
*राजा ने क्षमा याचना की और अपनी गलती के लिए पश्चाताप किया। संत रविदास जी ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा:- "चिंता ना करो राजा ! अब जो मैं तुम्हें नाम सुमिरन दूँगा उसका प्रेम और विश्वास से अभ्यास करना। वह अनमोल खजाना तुम्हें अंदर से ही मिल जाएगा।*
*राजा को समझ आ गई और उसने संत रविदास जी से नाम दान लिया और महात्मा बन गया।*
*गुरु पर कभी शक नहीं करना चाहिए, वह जो देते हैं या कहते हैं उसमें हमेशा शिष्य की भलाई ही होती है।*
राधास्वामी।
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