Saturday, March 14, 2020

शुकराना करते रहना चाहिए।




प्रस्तुति - उषा रानी /
 राजेंद्र प्रसाद सिन्हा


(११)  नित्य सत्तपुरुष राधास्वामी दयाल की दया और मेहर और सतगुरू की मदद और मेहरबानी का गुण गाते और शुकराना करते रहना।।                                                           (१२) जगत के परमार्थ की चाल और कर्म धर्म में जग जीवन का बर्ताव देखकर उसको, बामुकाबले अंतरमुख्य ऊँचे और गहरे और सच्चे परमार्थ राधास्वामी मत के, तुच्छ और हीन समझ कर उससे बचे रहना और अपने भागों को सराहना और किसी से विवाद और झगड़ा  बेफायदा ना करना न किसी पर तान मारना।।                                                           (१३) अपने मन और इंद्रियों की चाल को निरखते चलना और फजूल तरंगों और चाहों को हटाते रहना ।।                                        (१४) सच्चे मालिक राधास्वामी दयाल और संत सतगुरु की दया को अंतर और बाहर परखते चलना और चरणों में प्रीति प्रतीति बढ़ाते रहना।।                                                  (१५) अपनी नालायकी और निर्बलता की जांच करके सर्व अंग करके राधास्वामी दयाल की सरन दृढ करना और बेफायदा घबराहट छोड़कर धीरज के साथ दुरुस्ती से अभ्यास में लगे रहना।।                                     (१६) सत्संग और अभ्यास के समय दूसरे ख्यालों को , जिस कदर बन सके , मन में ना आने देना और जो ऐसे ख्याल पैदा होवें तो सुमिरन और ध्यान के बल से  हटाते रहना। (१७) जिस संग और सोहबत और तमाशे से मन में चंचलता और मलिनता, यानी भोगों की चाह पैदा होवे, ऐसे संग और तमाशे वगैरा से हमेशा जहां तक बन सके बचते रहना ।।                                                    (१८) जब कोई संशय या भरम या निरासता मन में जाहिर होवे, उसको फौरन अपने सत्संग की समझ के मुआफिक विचार करके, या सतगुरु या प्रेमी सत्संगी के सामने बयान करके, या बानी में से उसी किस्म के बचन निकालकर गौर के साथ पाठ करके, जिस कदर जल्दी बन सके उसको दूर करना कि जिसमें प्रीति और अभ्यास में विघ्न न पडे।।                                                    (१९) किसी सतसंगी की चाल ढाल नामुनासिब देखकर या सतसंग की कोई रीति अपनी समझ के मुआफिक फजूल जानकर सतगुरु और सत्संग में अभाव न लाना, क्योंकि सत्संग नाव है और इसमें हर किस्म के जीव, शुद्ध और मैले,शामिल होवेंगे। और जो सच्चे होकर लगेंगे, उनकी चाल आहिस्ता आहिस्ता बदलती जावेगी। परमार्थी को अपने काम बनाने का मतलब नजर में रखना चाहिये और औरों के काम में दखल देना अपना आकाज करना है।।*
[14/03, 06:44] +91 97830 60206: *(२१) जहां तक बन सके और जहां अपना किसी तरह का ताल्लुक ना होवे, वहां किसी का ऐब या बुराई देखकर उसका दूसरे से जिक्र करना या अपने मन में उसका ख्याल रखना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसी कार्यवाही से उस ऐब या बुराई का असर और नुकसान ऐब देखने वाले के मन में पैदा होगा और इसमें बेमतलब उसका अकाज होता है ।।     (२२) शील और क्षमा को , जहां तक बन सके हर जगह और हमेशा काम में लाना चाहिए , यानी सख्ती और तकलीफ और कड़वे बचन और तान की बरदाश्त करनी चाहिए और जल्दी भड़क कर झगड़ा और बखेड़ा पैदा करने और बढ़ाने की आदत छोड़नी चाहिए। यह आदत संसारियों की है कि अपना अहंकार और मान बड़ाई का ख्याल करके जल्दी लडने को तैयार हो जाते हैं, पर परमार्थी को दीनता और गरीबी के साथ बर्ताव करना चाहिए।  जो और कोई जगह इसका ख्याल कम रहे , तो सत्संग में जरूर लिहाज इस बात का रखना चाहिए कि किसी सत्संगी से झगड़ा और बखेड़ा पैदा ना होवे।।                                                               (२३) संत सतगुरु से नाराज होना नहीं चाहिए ।इसमें प्रेम अंग को बड़ा झटका लगता है। जो वे कभी बचन ताडना या समझौती का कहे, उसको चित्त देखकर सुनना और उसके मुआफिक जहाँ तक बन सके कार्रवाई करना चाहिए।।                            (२४)  जो कोई सतसंगी किसी दूसरे सतसंगी की बुराई या निंदा करें तो उसको नहीं सुनना चाहिए और उसको समझना चाहिए की यह आदत खराब है, बल्कि संसारियों में भी यह आदत बहूत बुरी समझी जाती है , क्योंकि जो कोई एक की बुराई और निंदा करता है वह इसी तरह सबकी बुराई और निंदा करता फिरेगा और अपना भारी नुकसान करता है कि उसके मन में सच्चे मालिक और गुरु का प्रेम कभी नहीं ठहरेगा और दूसरे के प्रेम और भक्ति को भी मेला करता है। परमार्थी को मुनासिब है कि हमेशा सबके गुण देखता रहे और अवगुण दृष्टि ना लावे ।और जो किसी सत्संगी में कोई अवगुण नजर पड़े तो उसको अकेले में प्यार से समझा देवें और जो वह उस औगुन को ना छोड़े तो सतगुरु से इत्तिला करें। वे जैसा मुनासिब समझेंगे  कार्रवाई करेंगे ,पर इसको चाहिए कि फिर उसका ख्याल अपने मन में ना रखें।" मत देख पराये औगुन। क्यों पाप बढ़ावे दिन दिन ।।।                                मक्खी सम मत कर भिन्न-भिन्न। नहिं खावे चोट तू छिन छिन।।।                                          देखा कर सबके तू गुन। सुख मिले बहुत तोहि पुन पुन ।। 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼

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