Thursday, March 12, 2020

परम गुरू हुजूर मेहता जी महाराज के बचन



प्रस्तुति-डा. ममता शरण / कृति शरण

परम गुरु हुज़ूर मेहताजी महाराज के बचन
बचन भाग -1
(44)
19 जनवरी, 1941- रविवार को लड़कों के सतसंग में एक शब्द पढ़ा गया-
समझ मोहि आई आज गुरु बात।
 (प्रेम बिलास, शब्द 120)  शब्द के समाप्त होने पर एक लड़के ने पूछा- ‘‘इस शब्द में करनी के ऊपर बहुत ज़ोर दिया गया है, परन्तु यह भी कहा जाता है कि बग़ैर भाग्य या क़िस्मत के करनी नहीं बन सकती फिर हुज़ूर आप ही बतलाइये कि अगर भाग्य ही इजाज़त न दे तो करनी कैसे बन सकती है ? ’’हुज़ूर ने फ़रमाया - यह दुरुस्त है कि आम तौर पर करनी के लिए भाग्य की आवश्यकता है लेकिन राधास्वामी दयाल में वह शक्ति है कि वह कर्म की रेख पर मेख मार सकते हैं और कर्म के वेग या प्रभाव को नष्ट कर सकते हैं जिससे कि वह बुरा कर्म भक्ति के मार्ग में बाधक न हो सके और भक्ति ठीक तरीक़े से बन सके।                 यदि आपने कुल शब्द को ध्यान पूर्वक सुना हो तो आपको पता चल जावेगा कि उसी शब्द के अन्दर प्रश्न का उत्तर भी दिया गया है। इसलिए शब्द दोबारा पढ़वाया गया और उसमें कड़ियाँ निकलीं।
’भाग जगे हुई सुरत सुहागिन, सतगुरु आय मिले मोहि नाथ।
अब मैं चेत करूँ नित करनी, जामें  चाल चले  दिन रात।।’
यानी सतगुरु के मिलने पर भाग्य जागता है और करनी बन आती है।
उसके बाद दूसरा शब्द पढ़ा गया। उसमें नीचे की कड़ियों पर हुज़ूर ने ज़ोर दिया।
यहाँ की ग़फ़लत बहुत सतावे, फिर आगे कुछ बन नहिं पड़ना।
 (सारबचन, बचन 15, शब्द 14)
  और फ़रमाया - इस कड़ी के शब्द, यद्यपि थोड़े हैं परन्तु अत्यंत भावपूर्ण हैं। हमको अवसर कभी हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। यदि एक दफ़ा अच्छा मौक़ा हाथ से जाता रहा तो फिर यह आशा करना कि ऐसा अवसर फिर हाथ लग जायगा ग़लत है। अंगरेज़ी में एक कहावत प्रसिद्ध है कि - Time once lost is never regained यानी एक बार अवसर हाथ से निकल जाने पर फिर वह दोबारा हाथ नहीं लगता। सतसंग के अन्दर जो लोग सुख के समय सँभल कर नहीं चले और ग़ाफ़िल व बदपरहेज़ बन कर जीवन व्यतीत करते रहे उनका जो आजकल हाल है उसे आप देख सकते हैं। हमको सुख के समय सँभल कर चलना चाहिये और जो अवसर हमें सतसंग के अन्दर मिला है उससे पूरा लाभ उठाना चाहिये।
           🙏🏻राधास्वामी🙏🏻

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