Thursday, March 12, 2020

सत्संग के मिश्रित प्रसंग बचन और उपदेश




प्रस्तुति - कृति शरण / सृष्टि शरण /
दृष्टि शरण /अमी शरण /मेहर स्वरूप

[13/

*परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-
रोजाना वाकियात- 4 अगस्त 1932-

 बृहस्पतिवार :-सुबह के वक्त टेक्निकल कॉलेज का सालाना मुआयना किया। सब इंतजाम दुरुस्त हैं लेकिन ओजार तेज करने की मशीन बुरी तरह हिलती थी जिसके लिए मिस्त्री को चेतावनी की गई।                       आज दिन भर बारिश होती रही । जमीन की प्यास बुझ गई। और आइंदा फसलों के लिए उम्मीद बंध गई।।                                            कर्नल डन ने बातों-बातों बतलाया कि उनकी राय में सबसे ज्यादा जरूरी रिआया को तंदुरुस्त रखना है जब किसान तंदरुस्त होंगे तभी वह जमीन अच्छी तरह जोत सकेंगे और तभी जमीन में काफी पैदावार होगी और तभी दुनिया का काम चलेगा । इस सिद्धांत को दृष्टिगत रखकर मेंबरान राधास्वामी सत्संग सभा व अन्य सत्संगी भाई समझ सकते हैं कि दयालबाग में डेरी कायम करने की कैसी अत्यंत जरूरत थी। दयालबाग के बच्चों के लिए काफी व उम्दा व खालिस दूध उपलब्ध करके हम लोगों ने अपनी संगत की जड़ों के खींचने का बंदोबस्त कर दिया है । कुछ अर्सा में मालूम होगा कि इस बुद्धिमानी का कैसा मनोवांछित नतीजा निकलता है ।अगर सत्संगी भाई बहने वह सब रकमें उनका बड़ा अंश जो मिठाइयों और चरपरी चीजों पर खर्च होता है खालिस दूध व मक्खन पर खर्च करें तो उनका खुद अपने पर और भी कुल संगत पर एहसान होगा ।।                             रात के सतसंग में बयान हुआ कि सतसंग का अभ्यास सीखने का अधिकार हासिल करने के लिए न ज्यादा विद्या की जरूरत है ना धन माल की और न आला खानदान की। जरूरत है तो इन तीन बातों की । अव्वल- दुनिया से किसी कदर सच्चे वैराग्य की, दोयम- चित्तवृति को अन्तर्मुख करने के शौक की और सोयम-  अंतर में धंसने और मालिक के दर्शन के लिए तड़प कीँ जिस शख्स के अंदर यह बातें मौजूद है वह बखूबी साधन की जुगतियाँ सीख कर लाभ व फायदा उठा सकता है ।
                          

  🙏🏻राधास्वामी🙏🏻*


परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज-

सत्संग के उपदेश-

 भाग 2-कल से आगे :-

असल वजह झगड़े व फसाद की यह है कि "एक अनार सौ बीमार" का मजमून है यानी दुनिया के अंदर
इंसान के पसंदेखातिर चीजें तो गिनती की होती है लेकिन उनके तलबगार बहुत होते हैं इसलिए तलबगारों में लड़ाई या खींचातानी जारी रहती है। चुनांचे तारीख बतलाती है कि अब तक जितनी भी लड़ाइयां हुई हैं वे सबकी सब इलाका, दौलत या स्त्रियों की प्राप्ति के लिए हुईं। कुरुक्षेत्र व लंका के युद्धों, महमूद गजनवी के हम्लो, अलाउद्दीन के कुश्त व खून, बाबर बादशाह के जंग व जदल, अकबर व औरंगजेब की चढ़ाईयों, शिवाजी की खूँरेजियों और सिक्खों की लडाइयों का कारण इनही में से कोई न कोई था।  दूर जाने की क्या जरूरत है , पिछली यूरोप की लडाई  को ही लीजिये - फ्रांस के एक जखरेज इलाके पर जर्मनी का अरसे से दांत था क्योंकि इस इलाके में कोयले, लोहे वगैरह धातुओं की बेशुमार खाने हैं । जर्मनी ने बहाना निकाल कर सन 1870 ईस्वी की जंग के बाद उस पर कब्जा कर लिया। जाहिर है कि ऐसा बेशकीमती इलाका खोकर फ्रांस कैसे चुप बैठ सकता था? चुनांचे 1914 ईस्वी की जंग के खात्मा पर फ्रांस में दोबारा इस इलाके पर कब्जा कर लिया । आसानी से नतीजा निकाला जा सकता है कि यह इलाका को बैठने के बाद जर्मनी के नेताओं की दिमागी हालत क्या होगी?  गर्जकि गौर करने पर हर लड़ाई का कारण तीनों में से कोई ना कोई जरूर निकलेगा जो बात है वही मुख्तलिफ जमाअतो के अंदर यानी गृह युद्ध का कारण होती है।

क्रमशः

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻**



[13/03**परम गुरु हुजूर महाराज

- प्रेम पत्र- भाग 1- कल से आगे:-

 शब्द असली जोहर की धार है और वही सुरत की धार हैं यानी जहां पर कि वह धार आकर ठहरी उसी को सूरत कहा जा सकता है और जब वहां से बदस्तूर फिर धार जारी हुई तब उसी का नाम शब्द हुआ और वह धारे या सुरत की धार कहलाई। देह में शब्द और सुरत की कार्यवाही का एक दृष्टांत दिया जाता है, उससे कुछ हाल उस कार्यवाही का समझ में आ सकता है। और वह दृष्टांत यह है:- जैसे कपड़ा बुनने की कल में यह रेलवे या किसी और कारखाने में जहां इंजन से काम लिया जाता है , इंजन ऊंचे के मकान में लगाया जाता है और वहां से एक बड़ी धार पहले बड़े रस्से पर आती है और उस बड़े रस्ते से छोटी-छोटी रस्सियों पर, जो कितनी ही कलों से लगी हुई है, वह धार आती है और उस धार की ताकत से सब कलें छोटी और बड़ी चलती है। पर यह शक्ति की धार जो कार्यवाही करती हैं दिखाई नहीं देती। अगर रस्सी टूट जावे तो धार का आना उस कल का काम जिससे रस्सी बंधी थी बंद हो जावे।  लेकिन यह रस्सी आप धार या धार  की शक्ति नहीं है, यह तो औजार है जिसके ऊपर सवार होकर आती है।  इसी तरह से आदमी की देह में भी रगें हैं और उन्ही रगों में होकर रुह की धार मस्तक से आती है और देह के अंग अंग को, जो एक-एक कल के समान है , ताकत देती है। यह धार भी नजर नहीं आती लेकिन उसकी कार्यवाही से उसका शरीर में आना मालूम पड़ता है। जैसे जब कोई सोते से जागा और कुछ काम करने लगा, तो मालूम हुआ कि शरीर में रुह की धार आई। इंद्रियों की कार्यवाही से रूम की धार का देह में आना मालूम होता है। इसी तरह जब लड़का पैदा होता है तब जो वह शब्द करता है उसे मालूम होता है कि वह जिंदा हुआ और जान की धार उसकी देह में आई, और नहीं तो वह मुर्दा समझा जाता है।

क्रमशः

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻*

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