प्रस्तुति- दिनेश कुमार सिन्हा / आशा सिन्हा
सूरदास की पुकार
कृष्ण मेहता:
एक बार सूरदास जी कही जा रहे थे....
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चलते चलते मार्ग में एक गढ्ढा आया और सूरदास जी उसमे गिर गए और
जेसे ही गढ्ढे में गिरे तो किसको पुकारते ?
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अपने कान्हा को पुकारने लगे भक्त जो ठहरे ! एक भक्त अपने जीवन में मुसीबत के समय में प्रभु को ही पुकारता है !
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और पुकारने लगे की अरे मेरे प्यारे छोटे से कन्हैया.... आज तूने मुझे यंहा भेज दिया और अब क्या तू यंहा नहीं आएगा... मुझे अकेला ही छोड़ देगा,
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और जिस समय सूर जी ने प्रभु को याद किया तो आज प्रभु भी उसकी पुकार सुने बिना नहीं रह पाए !
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सच है जब एक भक्त दिल से पुकारा करता है तो यह टीस प्रभु के दिल में भी उठा करती है और आज कान्हा भी उसी समय एक बाल गोपाल के रूप में वंहा प्रकट हो गए !
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और प्रभु के पांव की नन्ही नन्ही सी पेंजनिया जब छन छन करती हुई सूर जी के पास आई तो सूर जी को समझते देर न लगी !
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कान्हा उसके समीप आये और बोले अरे बाबा नीचे क्या कर रहे हो, लो मेरा हाथ पकड़ो और जल्दी से उपर चले आओ !
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जेसे ही सूरदास जी ने इतनी प्यारी सी मिश्री सी घुली हुई वाणी सुनी तो जान गए की मेरा कान्हा आ गया, और बहुत प्रसन्न हो रहे हैं !
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और कहने लगे की अच्छा बाल गोपाल के रूप में आ गए ! कन्हाई तुम आ ही गए न !
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बाल गोपाल कहने लगे अरे कोन कान्हा, किसका नाम लेते जा रहे हो, जल्दी से हाथ पकड़ो और उपर आ जाओ, ज्यादा बाते न बनाओ !
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सूरदास जी मुस्कुरा पड़े और कहने लगे सच में कान्हा तेरी बांसुरी के भीतर भी वो मधुरता नहीं,
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मानता हु की तेरी बांसुरी सारे संसार को नचा दिया करती है लेकिन कान्हा तेरे भक्तो की टेढ़ तुझे नचा दिया करती है !
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क्यों कान्हा सच है न तभी तो तू दोड़ा चला आया !
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बाल गोपाल कहने लगे अरे बहुत हुआ, पता नही क्या कान्हा कान्हा किये जा रहा है !
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मै तो एक साधारण सा बाल ग्वाल हु मदद लेनी है तो लो नहीं तो में तो चला, फिर पड़े रहना इसी गढ्ढे में !
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जेसे ही इतना कहा सूरदास जी ने झट से कान्हा का हाथ पकड़ लिया, और कहा कान्हा तेरा ये दिव्य स्पर्श, तेरा ये सनिध्ये ये सूर अच्छी तरह जानता है !
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मेरा दिल कह रहा है की तुम मेरा श्याम ही है !
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जेसे ही आज चोरी पकड़े जाने के डर से कान्हा आज भागने लगे तो सूर जी ने कह दिया-
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बांह छुडाये जात हो,
निबल जान जो मोहे
ह्रदय से जो जाओगे,
सबल समझूंगा में तोहे
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यंहा से तो भाग जाओगे लेकिन मेरे दिल की केद से कभी नहीं निकल पाओगे ! तो ऐसे थे सूरदास जी प्रभु के भक्त !
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धन्य है ऐसे भक्त जो प्रभु को नचा दिए करते है .।।
! श्री गुरुभ्यो नमः !!
" धन्य ! धन्य ! !" जो भगवान का भजन करते हैं ! { १ }
नारायण ! हम यहाँ जिस भजन शब्द का प्रयोग करके , उस पर सत्संग करने जा रहे हैं वह सामान्य दृष्टि का भजन नहीं है ! हमने किसी विशेष दृष्टि को लेकर भजन शब्द का प्रयोग किया है ! परमात्मा परमशिव का भजन अनेक प्रकार का होता है । भगवान् ने गीता में कई प्रकार के भजनानन्दी भक्तो का वर्णन किया लेकिन अन्त में कहा कि आत्मज्ञान के बाद का भजन किस प्रकार का होता है । भगवान् ने श्रीगीता जी के अठाहवे अध्याय में सारे ही साधनों को संक्षेप में कहा :
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहंकार बलं दर्पँ क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्च निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
{ भगवद्गीता }
भक्त ब्रह्म के साथ एक कैसे होता है इसकी सारी साधना संक्षेप में इन श्लोकों में बता दिया।
ब्रह्मभूत कैसा होता है ? " विविक्तसेवी " एकान्त देश में रहने वाला ; " लघ्वाशी " बहुत कम पदार्थोँ का सेवन करने वाला ; " यतवाक्कायमानसः " शरीर , वाणी और मन के ऊपर नियन्त्रण रखने वाला ; " ध्यानयोगपरो नित्यं " नित्य ही ध्यान - योग में लगा रहने वाला ; " वैराग्यं समुपाश्रितः " वैराग्य का सहारा लेकर अहंकार , बल , दर्प अर्थात् घमण्ड , काम , क्रोध और परिग्रह इन सबको छोड़कर ; " विमुच्य निर्ममः शान्तः " किसी भी पदार्थ से रहित होकर ; "
ब्रह्मभूयाय कल्पते " तब ब्रह्म के साथ एकता का अनुभव करता है । ये सब तो ब्रह्मभवन के पहले साधन हुए । अब उसके आगे भगवान् कहते हैं " ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् । " जब वह ब्रह्मीभवन हो गया अर्थात् अहंकार , बल , दर्प , काम , क्रोध , परिग्रह सब छोड़ चुका . इन्हें छोड़ने के बाद वह जब परब्रह्म परमात्मा के साथ अखण्ड अद्वैत का अनुभव कर रहा है , उसके बाद वह क्या करता है ?
भगवान् ने कहा " मद्भक्तिं लभते परां " तब परम भजन को प्राप्त करता है । यहाँ जो हमने कहा कि धन्य लोग भजन करते हैं , तो यह आत्मज्ञानी का भजन है , पराभक्ति है ।
नारायण ! भगवान् श्री मधुसूदन श्रीकृष्ण उसका सामान्य रूप पहले बता दिया " ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा " ; जब परब्रह्म परमात्मा से उसका एक्य है तो वह हमेशा ही प्रसन्नात्मा होता है , अर्थात् उसके देह , मन , बुद्धि सब नित्य प्रसन्न रहते हैं । सामान्य नियम है कि आग के पास बैठने वाला व्यक्ति अवश्य गरम हो जाता है , क्योंकि आग स्वरूप से गरम है । इसी प्रकार से जिस देह , मन , बुद्धि के साथ ब्रह्मभूत का थोड़ा भी सम्बन्ध हो गया , वहाँ प्रसन्नता अपने आप नृत्य करती है । वह प्रसन्न होता है , ऐसा नहीं समझना - मेरे बाबा । स्वभाव से ही वह प्रसन्न है । वह यदि कभी दुःखी बनने का ढोंग रचना भी चाहे तो जैसे अपना बच्चा कोई विचित्र - सा काम करता है तो माँ डाँटती है पर डाँटते - डाँटते उसे हँसी आ जाती है । एक अपना लड़का था , उसे पता था कि प्लग किसी छेद में लगाया जाता है । उसे छेद कहीं नहीं मिला , उसने उस प्लग को अपनी नाक में घुसा लिया ! अब उसे माँ डाँट भी रही है कि " बिजली की चीज़ को हाथ मत लगा , नहीं तो मारूँगी " , यह कहते - ही - कहते उसे हँसी छूट गई । उससे कहा " क्या फायदा हुआ यों डाँटने से ? " कहती है , " हँसी आ जाती है क्या करूँ ! " इसी प्रकार से किसी भी व्यक्ति को कोई ऊटपटांग काम करते देखकर भगवती डाँटती भी है तो अन्दर से उन्हें हँसी छूटती है । कारण क्या है ।
जब तक अन्तःकरण में बल , दर्प , काम क्रोध होता है तब तक यह लगता है कि यह गलत और ठीक है । अपने बच्चे के कार्य में गलती की भावना नहीं होती इसलिये उससे अन्तःकरण में एक प्रसन्नता होती है । इसी प्रकार से सर्वत्र सब परिस्थितियों में उसके अन्दर - ही - अन्दर प्रसन्नता का फव्वारा फूटता ही रहता है जब तक आत्मज्ञान में दृढ़ नहीं हो गया , तब तक तो जीव को यह नहीं पता कि सुख नाम की क्या चीज है । बेचारा एक दुःख से दूसरे दुःख में ही घूमता रहता है । यथाकथंचित् कभी किसी काल में दुःख कम हो गया तो उसे ही सुख मान लेता है । आत्म - ज्ञान की दृढ़ता के बाद उसे पता ही नहीं चलता कि दुःख नाम चीज क्या है । यथाकथंचित् लोगों के कहने से वह दुःख नाम की चीज़ चाहता भी है तो उसे कुछ समझ में नहीं आता ।
बिलकुल उल्टा हो गया । " न शोचति न कांक्षति " इसीलिये उसे न कभी किसी चीज का शोक होता है और न किसी चीज को प्राप्त करने की इच्छा ही होती है । भगवान् श्रीभाष्यकार आचार्य शङ्करभगवत्पाद् इसी के भाष्यम् में लिखते हैं " न हि
अप्राप्तविषयाकांक्षा ब्रह्मविदः उपपद्यते " जो विषय प्राप्त नहीं , उसकी आकांक्षा ब्रह्मवेत्ता में नहीं होती , युक्ति से भी सिद्ध नहीं होती । इसके दो कारण हैं एक तो कोई ऐसी चीज़ नहीं जो उसे पहले से प्राप्त न हो और जो प्राप्त नहीं वह पदार्थ है , ऐसा वह मान ही नहीं सकता । अर्थात् प्राप्त न होकर विषय कहीं पर रखा है , यह नहीं बनता , क्योंकि उसका मतलब हुआ कि कोई अज्ञात और अप्राप्त विषय है ; लेकिन बिना ज्ञान से सम्बन्ध किये विषय ठहरेगा किस पर ? इसलिये भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं कि अप्राप्त विषय की अकांक्षा उसे कभी होती ही नहीं । कांक्षा का मतलब ही होता है अप्राप्त विषय की इच्छा । जो चीज पहले पास नहीं है , उसी की तो इच्छा कांक्षा , आकांक्षा है । तत्त्वज्ञ की इच्छा हमेशा प्राप्त को विषय करती है । प्राप्त विषय की आकांक्षा रहती है , तो जो चीज अपने पास है उसकी इच्छा मनुष्य को कभी शोक नहीं दे सकती ।
नारायण ! शोक हमेशा अप्राप्त का होता है । इसलिये भगवान् ने कहा " न शोचति न कांक्षति । " ये दोनों एक - दूसरे में हेतुहेतुमद्भाव से संबद्ध है । आकांक्षा न होने से ही शोक नहीं है । यह उसका स्वरूप बताया कि स्व विषय में वह प्रसन्न रहता है , उसको कभी भी शोक और आकांक्षा नहीं होती ।
नारायण ! और " समः सर्वेषु भूतेषु " जब वह दूसरे को देखता है तो सम दृष्टि से देखता है । सारे ही प्राणियों को , चर - अचर अर्थात् जड - चेतन जगत् को वह सम अर्थात् एक जैसा ही देखता है । सबको एक जैसा ही देखता है इसका मायने क्या ? क्या सबको काला - ही - काला , या गोरे रंग का या नाटा - ही - नाटा अथवा लम्बा - ही - लम्बा देखता है ? भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं कि " सम " का मतलब है " आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च । " हर चीज को वह अपनी उपमा से समझ लेता है कि यह दुःख और सुख एक समान है । यदि उसे ठण्डी हवा अच्छी लगती है तो दूसरे को भी ठण्डी अच्छी लगती है , बड़ी सीधी - सी बात है ।
संसारी लोगों के व्यवहार " आत्मौपम्येन " नहीं होते , अपने कुछ कुछ और अच्छा लगता है , पर मानते हैं कि दूसरे को कुछ और अच्छा लगना चाहिये । अपने को आठ बजे उठना अच्छा लगता है , नौकरों को पाँच बजे उठना चाहिये । हमको रोज घूमने जाना अच्छा लगता है , नौकर को हफ्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं लेनी चाहिये । हम अपने अपने बच्चों के विवाह में पाँच हजार रुपये के बिजली की सजावट करेंगे , लेकिन मुनीम जी अपने बच्चे के विवाह में खर्च के लिये कुल पाँच हजार रुपये माँगे तो उन्हें नहीं माँगना चाहिये ।
यह संसारी अनात्मज्ञों का व्यवहार है । इसलिये तो भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं , सुख और दुःख प्रत्येक प्राणी के हृदय में अपनी आत्मा की उपमा से समझ लेनी चाहिये । यह बड़ी सीधी बात होने पर भी हमारा राग - द्वेष से आक्रान्त अन्तःकरण उसके अन्दर अनेक प्रकार के पर्दों का निर्माण करता है । हैं कि " सम " का मतलब है " आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च । " हर चीज को वह अपनी उपमा से समझ लेता है कि यह दुःख और सुख एक समान है । यदि उसे ठण्डी हवा अच्छी लगती है तो दूसरे को भी ठण्डी अच्छी लगती है , बड़ी सीधी - सी बात है संसारी लोगों के व्यवहार " आत्मौपम्येन " नहीं होते , अपने कुछ कुछ और अच्छा लगता है , पर मानते हैं कि दूसरे को कुछ और अच्छा लगना चाहिये । अपने को आठ बजे उठना अच्छा लगता है , नौकरों को पाँच बजे उठना चाहिये ।
हमको रोज घूमने जाना अच्छा लगता है , नौकर को हफ्ते में एक दिन भी छुट्टी नहीं लेनी चाहिये । हम अपने अपने बच्चों के विवाह में पाँच हजार रुपये के बिजली की सजावट करेंगे , लेकिन मुनीम जी अपने बच्चे के विवाह में खर्च के लिये कुल पाँच हजार रुपये माँगे तो उन्हें नहीं माँगना चाहिये । यह संसारी अनात्मज्ञों का व्यवहार है । इसलिये तो भगवान् भाष्यकार आचार्य शङ्कर कहते हैं , सुख और दुःख प्रत्येक प्राणी के हृदय में अपनी आत्मा की उपमा से समझ लेनी चाहिये ।
यह बड़ी सीधी बात होने पर भी हमारा राग - द्वेष से आक्रान्त अन्तःकरण उसके अन्दर अनेक प्रकार के पर्दों का निर्माण करता है । पर्दोँ का निर्माण करके अनात्म - दृष्टि के ऊपर आग्रह वाला बनता है । जहाँ - जहाँ भेद है वहाँ - वहाँ उपाधि की प्रधानता है और जहाँ अभेद है वहाँ उपाधि वाले की अर्थात् उपहित की प्रधानता है । ज्ञानी को उपाधि नहीं दीखती ऐसा नहीं है , लेकिन वह उपाधि के द्वारा उपहित को पकड़ता है । जैसे घड़ा है , अज्ञानी को भी दीखा , ज्ञानी को भी दीखा । अज्ञानी को घटरूपी उपाधि प्रधान दीखी , " है " रूपी परमात्मा गौण दीखा । ज्ञानी को " है" - रूप उपहित प्रधान दीखा , घट ने केवल व्यक्त कर दिया । इसलिये ज्ञानी व्यवहार के अन्दर उपहित को प्रधान लेता है और अज्ञानी उपाधि को प्रधान लेता है । उपहित सर्वत्र एक है , उपाधि अलग - अलग है । इसीलिये भगवान् भाष्यकार आचार्य सर्वज्ञ शङ्कर ने सीधी - सी पहचान बता दी " आत्मौपम्येन सर्वँ समं दुःखं सुखं च " ।
सावेशेष .....
नारायण स्मृतिः।।।
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श्री गणेश की दाईं सूंड या बाईं सूंड?
अक्सर श्री गणेश की प्रतिमा लाने से पूर्व या घर में स्थापना से पूर्व यह सवाल सामने आता है कि श्री गणेश की कौन सी सूंड होनी... चाहिए ?
क्या कभी आपने ध्यान दिया है कि भगवान गणेश की तस्वीरों और मूर्तियों में उनकी सूंड दाई या कुछ में बाई ओर होती है। सीधी सूंड वाले गणेश भगवान दुर्लभ हैं। इनकी एकतरफ मुड़ी हुई सूंड के कारण ही गणेश जी को वक्रतुण्ड कहा जाता है।
भगवान गणेश के वक्रतुंड स्वरूप के भी कई भेद हैं। कुछ मुर्तियों में गणेशजी की सूंड को बाई को घुमा हुआ दर्शाया जाता है तो कुछ में दाई ओर। गणेश जी की सभी मूर्तियां सीधी या उत्तर की आेर सूंड वाली होती हैं।
मान्यता है कि गणेश जी की मूर्त जब भी दक्षिण की आेर मुड़ी हुई बनाई जाती है तो वह टूट जाती है। कहा जाता है कि यदि संयोगवश आपको दक्षिणावर्ती मूर्त मिल जाए और उसकी विधिवत उपासना की जाए तो अभिष्ट फल मिलते हैं। गणपति जी की बाईं सूंड में चंद्रमा का और दाईं में सूर्य का प्रभाव माना गया है।
प्राय: गणेश जी की सीधी सूंड तीन दिशाआें से दिखती है। जब सूंड दाईं आेर घूमी होती है तो इसे पिंगला स्वर और सूर्य से प्रभावित माना गया है। एेसी प्रतिमा का पूजन विघ्न-विनाश, शत्रु पराजय, विजय प्राप्ति, उग्र तथा शक्ति प्रदर्शन जैसे कार्यों के लिए फलदायी माना जाता है।
वहीं बाईं आेर मुड़ी सूंड वाली मूर्त को इड़ा नाड़ी व चंद्र प्रभावित माना गया है। एेसी मूर्त की पूजा स्थायी कार्यों के लिए की जाती है। जैसे शिक्षा, धन प्राप्ति, व्यवसाय, उन्नति, संतान सुख, विवाह, सृजन कार्य और पारिवारिक खुशहाली।
सीधी सूंड वाली मूर्त का सुषुम्रा स्वर माना जाता है और इनकी आराधना रिद्धि-सिद्धि, कुण्डलिनी जागरण, मोक्ष, समाधि आदि के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। संत समाज एेसी मूर्त की ही आराधना करता है। सिद्धि विनायक मंदिर में दाईं आेर सूंड वाली मूर्त है इसीलिए इस मंदिर की आस्था और आय आज शिखर पर है।
कुछ विद्वानों का मानना है कि दाई ओर घुमी सूंड के गणेशजी शुभ होते हैं तो कुछ का मानना है कि बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ फल प्रदान करते हैं। हालांकि कुछ विद्वान दोनों ही प्रकार की सूंड वाले गणेशजी का अलग-अलग महत्व बताते हैं।
यदि गणेशजी की स्थापना घर में करनी हो तो दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी शुभ होते हैं। दाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी सिद्धिविनायक कहलाते हैं। ऎसी मान्यता है कि इनके दर्शन से हर कार्य सिद्ध हो जाता है। किसी भी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते समय यदि इनके दर्शन करें तो वह कार्य सफल होता है व शुभ फल प्रदान करता है।इससे घर में पॉजीटिव एनर्जी रहती है व वास्तु दोषों का नाश होता है।
घर के मुख्य द्वार पर भी गणेशजी की मूर्ति या तस्वीर लगाना शुभ होता है। यहां बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी की स्थापना करना चाहिए। बाई ओर घुमी हुई सूंड वाले गणेशजी विघ्नविनाशक कहलाते हैं। इन्हें घर में मुख्य द्वार पर लगाने के पीछे तर्क है कि जब हम कहीं बाहर जाते हैं तो कई प्रकार की बलाएं, विपदाएं या नेगेटिव एनर्जी हमारे साथ आ जाती है। घर में प्रवेश करने से पहले जब हम विघ्वविनाशक गणेशजी के दर्शन करते हैं तो इसके प्रभाव से यह सभी नेगेटिव एनर्जी वहीं रूक जाती है व हमारे साथ घर में प्रवेश नहीं कर पाती।।।
सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार। क्यों??
गंगासागर भारत के तीर्थों में एक महातीर्थ है। गंगाजी इसी स्थान पर आकर सागर में मिलती हैं। इसी स्थान पर राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ था। यहां मकर संक्रान्ति पर बहुत बड़ा मेला लगता है जहां लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए आते हैं। कहते हैं यहां संक्रान्ति पर स्नान करने पर सौ अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गऊएं दान करने का फल मिलता है।
गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।'
' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं।
यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकाकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है।
इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल।
मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के लिए स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं।
सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं।
कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है।
उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं।
रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया।
राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था।
अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये।
वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ।
' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्स्थिति समझ गया।
उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की।
लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए।
भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया।
गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा।
भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा।
जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसमें बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है।
🌷प्रेरणादायक कहानियां🌷*
*💐अनोखी_परीक्षा💐*
"बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।" लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये।
"देख मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"
एक गरीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी।
"बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट ..
मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!"
ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।
12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।
हालांकि भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे। और उनके सभी विद्यार्थी विविधतासभर ये परीक्षा अचूक देने जाते थे।
इस साल परीक्षा का विषय था #मेरी_पारिवारिक_भूमिका
मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।
उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।
भागवत सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।
मोहन ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की।
प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तर बताइये?
मोहन ने त्वरा से जवाब लिखना शुरू कर दिया।
जवाबः
पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्षा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्धी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।
मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो
जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे।
दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जोब करती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।
मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।
(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।)
पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..
प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?
जवाबः
पापा की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार
जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार।
प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा होल का पता और अभी वहां चल रही मुवी का नाम बताइये?
सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये ..
प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस घन्टी का पता दिजिये।
मोहनभाई को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की
जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटोर कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं।
प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?
जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ।
(इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मम्मी की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूंक दिया था। और फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जीद्द के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?)
मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर
अगले प्रश्न को पढा
प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जीद्द के बारे में लिखिये ..
मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जीद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था, मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जबतक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला
हूँ।
अपनी जीद्द का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।
प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?
जवाब: हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।
मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं।
प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो?
प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।
परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददरूप होना चाहिये। और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये।
यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे मोहन! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि #ना बिल्कुल नहीं ..!!
प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से
आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जीद्द करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?
(इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले हुए मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)
लिखने की शुरुआत की ..
वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जीद्द नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रोमिस तोडे हैं।
फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।
प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददरूप होंगें?
जवाब में मोहन की कलम चले इससे पहले उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के निचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।
स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।
"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।"
दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।
"कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।
दीदी ने बताया
"मैंने मेरी ओफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पोकेटमनी की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।
मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।
दीदी फिर बोली " भाई, तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगे तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौख हैं, लेकिन अपने शौख से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पापा को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रोमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रोमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है।
बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रोमिस तोडे ही है न?
मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।
उसी समय उनका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।
"ले .. मोहन आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।"
मोहन बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला
"दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल संभावना भी नहीं है।"
और वो सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहुंचा।
"अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में?
भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।
"सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा।
और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।
घर पहुंचते ही, मम्मी पापा दीदी सब उसकी राह देखकर खडे थे।
"बेटा! बाइक कहाँ हैं?" मम्मी ने पूछा।
मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और पापा मुझे ओटो की
चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मम्मी आज मैं मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।
मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मम्मी उसको गले लगा लिया और कहा कि "बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पापा को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।"
मोहन ने कहा
"नहीं मम्मी! अब मेरी समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस घंटी का नाम और पता भी मुझे दे दो"
और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले "वाह! मोहन जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे ..👌🏻👍🏻😊
"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।
"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था।
मेरी #अनोखी_परीक्षा सफल रही 😊
और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।"
ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।
मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ओटोरिक्षा चलाने के लिये निकल पडा।
#स्टेटस
परिवार नाम का भले ही कोई वार न हो,
लेकिन उसके बगैर एक भी त्यौहार नहीं है।
नम्रता से विनय विवेक से बडे छोटे का सम्मान के साथ समजदारी से साथ रहना सर्वश्रेष्ठ हैं।
*मित्रों, आप भी अपने जीवन की प्राथमिकताओं पर ध्यान देते हुए जीवन के लक्ष्य हासिल करें ।*
🙏🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏
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