Monday, May 4, 2020

प्रेम




प्रेमी को प्रतिद्वंद्वी समझने भूल

जाना राम प्रभाउ तब "पुलक प्रफुल्लित गात"।
जोरि पानी बोले बचन "हृदयँ न प्रेमु अमात" ।।

गोस्वामी जी लिखते हैं कि  जब परशुराम जी श्रीराम जी के प्रभाव को जान गए तो उनके रोम रोम पुलकित हो गए , उन्हें श्रीराम जी के प्रति हृदय में इतने अधिक मात्रा में स्नेह उमड़ पड़ा कि मानो हृदय छोटा पड़ गया..."हृदयँ न प्रेमु अमात"!!!("अधिक उछाहु भवन अति थोरा" )
इस दृश्य को देखने के बाद, अध्ययन करने के बाद भी यदि कोई परशुराम जी को श्रीराम विरोधी घोषित करने की चेष्टा करे तो उसके बुद्धि विवेक पर तरस आनी चाहिए।
भला कोई विरोधी के प्रभाव देखकर जलने लगेगा कि प्रसन्न होगा??
क्या विरोधी के लिए हृदय में इतना स्नेह होता है क्या???
परशुराम जी वास्तव में श्रीराम जी को कुछ देने आए...
"राम ! रमापति !!"
हे श्री हरि ! श्रीराम रूप में अवतरित लक्ष्मी पति श्री हरि विष्णु जी!! आप कृपा कर अपने धनुष को अब अपने हाथ में लीजिए...कर धनु लेहू!!!!
दूसरा....
"मयि स्थितं तुत्वतेजः त्वयमेव पुनराहृतम् "!!!
वे अपने तेजोशक्ति श्रीराम जी को प्रदान करते हैं।
आपने सहस्राबाहु सहित दुष्ट प्रवृत्ति के राजाओं के मान मर्दन हेतु जो तेज शक्ति प्रदान किए थे,उसे स्वीकार करें।
अब रावण आदि दुष्टों के संहार का दायित्व आपके हाथों में....गहन दनुज कुल दहन कृसानू!!!!

सीताराम जय सीताराम
सीताराम जय सीताराम

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